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मुख्य मुद्दा
पहाड़ को लूटती भूमंडलीय पूंजी
Posted on: 2014-01-10

 जून 2013 में पहाड़ में आए जल प्रलय और उससे जुड़ी त्रासदी के हवाले से कुछ बातें

यह विपदा पहली बार नहीं टूटी है। कुदरत इसी तरह से प्रहार करती आई है। आंकड़े और इतिहास सब है। हम उन त्रासदियों का लेखाजोखा नहीं बताना चाहते हैं। हम जो अब कुछ निर्णायक और आगे की कुछ बातें करना चाहते हैं। 16-17 जून 2013 का प्रहार विध्वंसक था, जानलेवा था। सैलानी थे शोर था वाहन थे धर्मांधता थी। और वर्चस्व और विवाद थे। और इधर जब आंसू सूख चुके हैं और दूर गिरी ज़िंदगियां थके कदमों से लौट रही हैं तो ऐसे में नया शोर आ रहा है। विपदा जैसे कहर बरपाकर बौद्धिक और एनजीओइक उत्पात मचाने निकल गई है।

इतनी सब को पहाड़ की बेबसी याद आ रही है और इतना क्लाइमेट चेंज,ग्लोबल वॉर्मिंग, पर्यावर'न', प्रदूषण, तूतूमैंमैं, तू समर्थक मैं विरोधी तू कविता मैं बयान तू निष्क्रिय मैं हैरान हो रहा है कि सत्ताएं आंखें झपकाए सुस्ताने चली गई हैं। बोल लें तो हम अपने मन की करें। ऐसी निर्विकारता और बेशर्मी है। उत्तराखंड की त्रासदी पर विलाप जारी हैं, हिसाब साफ किए जा रहे हैं, एक दूसरे को धकियाना धमकाना और धिक्कारना जारी है। ताज्जुब है ऐसे ऐसे व्याकुल लोग प्रकट हुए हैं जिन्होंने उत्तराखंड के पिछले 13 साल में एक भी किसी जनविरोधी मुद्दे पर टीका करना गंवारा न समझा था। इस आपदा ने तो जैसे सारे ताले खोल दिए हैं। सारे मुंह उत्तर और हिमालय की ओर हुआं हुआं करते हुए दिखते हैं।

क्या ऐसा था इस आपदा में कि सारे जोर आ गए। कोसने की एक अभूतपूर्व बेला आ गई। सारे दर्द छलक पड़े। और एक अजीब किस्म की अश्लीलता...आसान लड़ाइयां चुनी गई हैं। खुलेआम लूट है। और सिर्फ पक्ष विपक्ष ही बना है। तुम सरकार बनो हम विपक्ष। तुम संसद हम सड़क। उत्तराखंड मानो कोई लेबोरेटरी है। बनी बनाई परियोजनाओं का विरोध आसान है बनिस्पत की प्रस्तावित बांध के पहले पत्थर के पास आमरण अनशन पर बैठ जाना। न बनने देने की अटूट ज़िद के हवाले से डटे रहना। अब चिल्लाते हो। बांध के लिए सिर्फ।

पहाड़ की पूरी गतिशीलता को और संभावनाओं को भंग करने के लिए और क्या क्या हुआ नहीं बोलोगे। टिहरी बांध सत्तर से होता हुआ दो हजार से आगे तक आकर बन गया। आंदोलन हुए और टूट गए। पुनर्वास भ्रष्टाचार की सदाबहार एक्सरसाइज़ बन गया। कितने लोग पेड़ से चिपके हैं और जंगल को बचाया है। कितने लोग बांध के लिए मशीन आते ही उसके आगे लेट गए हैं। कितने लोग बांध के पहले पत्थर के ऐन पास आमरण अनशन पर बैठ गए हैं। जैसे जैसे पानी बढ़ता है तंबू डेरे जाने लगते हैं। गले गले तक पानी क्यों नहीं आने दिया। सरकार को क्यों नहीं डराया। टिहरी में अशोक सिंघल को घुसने दिया। कैसे। और क्यों। पुनर्वास की लड़ाई गंगा प्रवाह के अवरूद्ध होने या न होने की लड़ाई बन गई। इस एजेंडे पर सब चुप क्यों थे।

पर्यावरण के एजेंडे ने धर्मांधता के एजेंडे के आगे घुटने टेक दिए थे। या वो असल में एक ही तंबू से निकली एक ही एजेंडे की दो धाराएं थीं। मानते तो फिर ऐसा मानते जैसा नियमागिरी के आदिवासी मानते हैं। हरा दिया है। इष्ट देवता के घर को खोदने नहीं दिया। मानते कि वैसी आस्था है। ऐसी अद्भुत भक्ति। ऐसा तपस्वी समर्पण और उनका विरोध किसी अध्यात्म के हवाले से नहीं आता था। मंगलेश डबराल की कविता के हवाले से कहें वो गहरा अरण्य उनका अध्यात्म नहीं उनका घर है। विकास के पुरोधा कहते हैं कि आदिवासियों को डिट्राइबलाइज़ करना होगा, वे कब तक अपने अंधेरों में रहेंगे।

भाला बरछी तीर धनुष और अजीबोगरीब पोशाक, अजीबोगरीब भाषा और अजीबोगरीब जीवन के साथ। उन्हें मुख्यधारा मे लाना होगा। और कैसे लाते हैं। उनके लिए अच्छी शिक्षा अच्छा पोषण अच्छा स्वास्थ्य अच्छी सुविधा लाकर उन्हें संबल नहीं देते। उन्हें उनके जीवन और संस्कृति से बेदखल करके उस कथित मेनस्ट्रीम में लाते हैं जिसे कन्ज़मयूमरिज़म कहते हैं। मास मीडिया के उत्पादों का जखीरा वहां भिजवाते हैं और उन्हें सांस्कृतिक उत्पादों का हैरान परेशान उचका हुआ उपभोक्ता बना देते हैं। जो कटेंट रवाना किया जाता है वो लुभावना है। चमकदार जिंदगियों की दावत देता हुआ। हमारा सवाल यही है कि नियमागिरी जैसे इलाके क्योंकर इस दावत को ठुकरा कर जैसे हैं वैसा ही बने रहना उचित समझते हैं और क्योंकर उत्तराखंड के पहाड़ों में विकास बुखार की तरह फैल जाता है और संक्रामक हो जाता है।

पहाड़ की परंपराएं और सामाजिक व्यवस्थाएं छिन्न भिन्न हुई हैं। चार धाम की यात्रा के लिए कहे जाने वाले रास्तों पर आखिरी कोनों तक आप चले जाइये, पहाड़ का स्थानीय भोजन नहीं मिलेगा। दाल मक्खनी, पनीर मसाला, नान, मैगी नूडल, कोक, पेप्सी, फेंटा और कुछ ऐसा ही मैदानी ढाबावाद। स्कूलों के, अस्पतालों के, बीमारी से सावधानी बरतने के, सामाजिक कामों के जागरूकता विज्ञापनों से ज्यादा कच्चे घरों और चट्टानों और साइन बोर्डों पर मास मीडिया उत्पादों के इश्तहार हैं। पहाड़ की चट्टानों को जितना सीमा सड़क संगठन के डायनामाइटों ने उड़ाया है उतना ही ये नई रंगीनियों के निमंत्रण के इन इश्तहारों ने उन्हें फोड़ा है। चट्टान गायब हुई उस जैसा विरोध भी नहीं रहा। पहाड़ सिर्फ भूकंप के ज़ोन पांच और ज़ोन चार के अवश्यंभावी भूगर्भीय संकट से नहीं घिरे हैं, वे गैर कुदरती आफतों के लपेटे में भी हैं। प्रतिरोधी कार्रवाईयां धुंधली पड़ जाती हैं और दुविधाएं आने लगती हैं और एजेंडे घुलमिल जाते हैं तो यही होता है।

एक के बाद एक घातक वार। लोग ठेकेदार को एक ''सेवियर'' की तरह देखने लग जाते हैं, वह नौकरी देगा, घर में कुछ राशन और कुछ राहत देगा। वे अपनी विवशता में इतने टूटे हुए लोग हो जाते हैं। सरकारें उन्हें बहलाती हैं। उद्योग और संभावित रोज़गार से रिझाती हैं। खेत को हमारे हवाले कर दो और हम तुम्हें अन्न के बदले रूपए देंगे। नौकरी देंगे। अवसर देंगे। तुम्हें हम शहर भेज देंगे। तुम्हारा यहां क्या काम। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और भूमंडलीय ''नाट्य'' कंपनियों के एजेंडे में एक महत्वपूर्ण बिंदु ये भी है कि कितने लोग गांव देहातों से शहरों की ओर रवाना होते हैं।

शहरों की ओर उन्हें खदेडऩे का एक अघोषित लेकिन सुनियोजित अभियान रहा है और सरकारी अर्ध सरकारी और एनजीओ वालों के कार्यक्रम इस दिशा में सहयोग करते हैं। उनकी मशीनें और उनके अफसर और उनके विचार और उनके पंफलेट और प्रचार ऐसी हवाएं उड़ाते हैं कि लोग बौखलाए से निकलते हैं। उन्हें अपनी जगहें अचानक ही दुश्मन जमीन लगने लगती है वे दैवीय कोप या ईश इच्छा या नियति कहकर या तरक्की की एक निरीह सी कामना लेकर निकल जाते हैं और लौटते नहीं। रही सही कसर कुदरती आफतें पूरा कर देती हैं। भूर्गभीय रूप से नवजात पहाडिय़ां भारी बारिश में दरकने लगती हैं, घाटियों में घनीभूत बारिश जमा हो जाती है और मकान और मिट्टी का धंसाव शुरू हो जाता है जैसे कोई अदृश्य आरी इस गीली धरती को काटती आ रही है।

नदियां इस मलबे से भर गई हैं, उनमें निर्माण का मलबा जमा है और ये निर्माण बांध से लेकर होटलों तक का है। खेत और जमीनें खाली हो रही हैं और आने वाले वक्तों में किसी न किसी रूप में से इलाके कॉरपोरेट के हवाले हो जाने वाले हैं। बिजली और उद्योग तो छोड़ ही दीजिए, खेती भी कॉरपोरेट ही होगी। खाद्य सुरक्षा कानून अपनी तमाम बुनियादी अच्छाइयों के बावजूद अंतत: पलायन की एक बहुत तीखी पुडिय़ा है। ये पुडिय़ा देने का काम उत्तराखंड में शुरू हो चुका है। किसान अब धूल मिट्टी बीज खाद गोबर और अन्न से सने और लथपथ व्यक्ति को नहीं कहेंगे, भूमंडलीय भाषा में किसानी नए मुकुट से सजी एक कॉरपोरेट युक्ति होगी। वो मैनेजमेंट का पार्ट होगी। कुछ लोग कहेंगे ठीक तो है क्या किसान का वही मेटाफर बनाए रखना चाहते हो।


वो भी तो तरक्की करता हुआ भूमंडल में प्रवेश करेगा। सत्यजित रे की फ़िल्मों के बारे में भी कभी ऐसा ही कुछ कहा गया था कि वे देश की अथाह मायूसी दिखाती हैं और क्यों दिखाती हैं। खैर। हम खेती किसानी के बदलाव की बात कर रहे थे। अब आप इसे बहुआयामी, बहुपरतीय और कई कोनों से आते हुए हमलों की तरह देखिए। बांध तो पीछे छूट गए हैं। अगर आप जलबिजली परियोजना के लिए मना करेंगे तो वे एटमी परियोजना लाएंगें। अगर आप परियोजनाएं नहीं चाहेंगे तो वे कोक का प्लांट ले आएंगे। भूजल का दोहन दूसरे ढंग से होगा, पर्यावरण का विनाश होगा और मास मीडिया संस्कृति पनपेगी। ये हमले के भीतर का हमला है। हम जानते हैं कि नियमागिरी की लड़ाई में उनकी निर्णांयक हार नहीं हुई है।

वे नए निशाने ढूंढ रहे हैं और खनिजों से उत्तराखंड के पहाड़ भी भरे हैं। हिमालय कमजोर और कच्चा और शिशु पहाड़ हुआ तो क्या। जितना जल्दी वो धराशायी हो उतना अच्छा क्योंकि उसके अंदर और उसके नीचे का अतुल भंडार और स्पष्ट दिखेगा। यानी ये कामना इतनी प्रबल है कि इससे आंखें और दिमाग चौंधिया गए हैं। हिमालय गिरेगा तो क्या बचेगा। किसे फुरसत है। पंचायत अधिकार शून्य हैं। उन्हें समझने और बरतने वाले और भी बड़े शून्य में घिर जाते हैं। सत्ता संस्कृति ऐसा बना देती है। गठजोड़ की वो पहली कड़ी है। उद्योगपति और सितारे लोग तो हेलीकॉप्टर में आते हैं और केदारनाथ बदरीनाथ के दर्शन कर निकल जाते हैं। उनके लोग ज़मीन पर काम में लगे हैं। क्या आपको अपने ही लोगों के खिलाफ आगे बढ़ती एक नए किस्म की फौज नज़र नहीं आती। बहुत ध्यान से आप देखेंगे तो ये फौज बढ़ी चली आ रही है और पहाड़ में कोई क़िले नहीं है। सारे दुर्ग ढह गए हैं।


जनता बचीखुची सामथ्र्य और बचेखुचे अविश्वास के साथ जब तक है तब तक है। छटपटाहट इस समय पूरे पहाड़ का चक्कर काट रही है। ऐसे इन अति पेचीदा, जटिल और मुश्किल समयों में कैसी लड़ाई चाहिए होगी। उसका स्वरूप क्या होगा। उसे भी वैसा ही परतदार और कई आयाम वाला होना होगा जैसे कि हमले हैं। तुम पर्यावरण पर्यावरण चिल्लाकर इस लड़ाई को जीत नहीं सकते, ये खेल होगा एक सिस्टेमैटिक मूवमेंट चाहिए। नारों से और कपटी किस्म के संरक्षणवाद से लोगों को मत बहलाओ। असमंजस के और तकलीफ के एक बहुत गहरे कुएं में धकेल दिए जाते हैं वे। उन्हें कहां तो एक मुकम्मल लड़ाई के लिए तैयार रहना था कहां वे विरोध और समर्थन के बीच झूल जाते हैं। सरकारें और उनके नुमायंदे उनके संसाधनों को खसोटें और तुम सरकारों को और उनकी मशीनरी को घेरो खसोटो। इनाम अटेंशन और फंड बटोरो और निकल जाओ नए इलाकों की तरफ। ल

ड़ाई को एक शक्ल लेने की नौबत बनने से पहले ही क्योंकि तुम्हें फिर लौटना पड़ सकता है। तुम जनता को झोंके रखोगे और दूर से सबको दिखाओगे देखो वह जनता मर रही है। जबकि जहां तुम दिखाते हो वहां से जनता टूटे कदमों से कबकी लौट चुकी होती हो। तुम भटकती हुई छायाएं देखते हो। वे मृतात्माएं हो सकती हैं। थोड़ा जलबिजली के हवाले से कुछ देखते हैं। आज उत्तराखंड में चालीस हजार से ज्यादा एनजीओ हैं। 12 साल में परियोजनाएं देखें तो राज्य में 98 जलविद्युत परियोजनाएं चालू हैं और 111 निर्माणाधीन हैं। वर्तमान कार्यरत परियोजनाओं की कुल स्थापना क्षमता 3600 मेगावाट है। 21,213 मेगावाट की 200 परियोजनाएं योजना में हैं। ये उत्तराखंड जलविद्युत निगम के आंकड़े हैं। योजना आयोग ने 2032 से उत्तराखंड से 1,32,000 मेगावाट विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा है। केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार देश की 89 प्रतिशत जलविद्युत परियोजनाएं स्थापना क्षमता से कम उत्पादन कर ही हैं।

उत्तराखंड भी उत्पादन के मामले में अलग नहीं। फिर ये परियोजनाएं क्यों। और उत्पादित हो रही बिजली। क्या वो हमें मिल रही है। नगण्य और रोजगार वह भी नगण्य। क्या चालीस हजार एनजीओ एक साथ आ जाते और प्रतिरोध की एक महान दीवार खड़ी कर देते तो क्या 70 सीटों वाली विधानसभा में 12 मंत्रियों के साथ बैठने वाली सरकार की हिम्मत होती कि वो हमारे जल जंगल का ऐसा दोहन करती आती। उसे किसी को भी कुछ भी सौंप देने की जुर्रत होती। अपनी जनता को वो चंद अवसरों और चंद रंगीनियों में उलझाकर पहाड़ को रौंदने के लायसेंस दे देती। और ये तो आप भी मानेंगे कि अगर अंधेरे में निकलना है तो टॉर्च की रोशनी सब तरफ घुमाएंगें। सारा अंधकार परखेंगे फिर आगे बढ़ेंगे।

टॉर्च लेकर अपने लायक रास्ता और रोशनी बनाकर आगे बढ़ेंगे तो कहां जाएंगे। उस अंधकार को कौन टटोलेगा जो आपके साथ साथ चला आता है। बिजली की ही बात करते हैं। विकल्प तो दो। एटमी ऊर्जा लगा दें। रूस या कहीं और से उधार लेकर संदेहों और खतरों से भरी हुई। हमें बांध नहीं चाहिए। पर हमें बिजली तो चाहिए। नदी के वेग से मुकाबला करने की तकनीकी सामथ्र्य तो दो. क्या वो विक्रांत और अरिहंत और कुडनकुलम के लिए ही है। नदी का रास्ता नहीं रोकेंगे लेकिन अच्छा हमारे बच्चों को स्कूल भिजवाने का जतन तो करो। हमारी स्त्रियों के लिए अस्पताल करो। वहां रोशनी का इंतज़ाम करो। सत्ताएं हमारी जरूरत को लूट का बिंदु बनाती हैं। दलाल पूंजीवाद पहाड़ फोड़ता है सुरंग डालता है खनन करता है।


निम्न दर्जे का रोजगार देता है। माल ढुलाता है दिहाड़ी देता है। फिर हमें कहता है दफा हो जाओ। ये बिजली बाहर जाएगी। इस तरह हमारा विकास हो जाता है कि बांध आ आता है कि हमें वही चाहिए एक स्कूल और एक पुल और एक मास्टर और कुछ किताबें और एक अस्पताल और कुछ गीली दवाइयां ले आई जाती हैं बस। हम कहां जाएं। एक भी किसी बड़े पूंजीपति का पहाड़ में कोई कल्याणकारी प्रोजेक्ट है। धर्म और आस्था की फैक्ट्रियों की बात हम नहीं कर रहे। कोई एक बड़ा और सुगम और सुविधा संपन्न अस्पताल है। कोई एक ऐसा स्कूल है जो सरकारी किरपा और कुप्रबंध से बाहर का हो। कोई सड़क है जो बुरे मौसमों और बुरे ठेकों से बाहर जाती हो। कोई उद्योग है जिसमें एक कोऑपरेटिव महक आती हो और वो चंद बिचौलियों और चंद मुनाफाखोरों के लिए न हो।

सरकार के ऐसे किसी प्रोजेक्ट का नाम बताइये। ठीक है। लड़ाइयां कमतर नहीं। बांध विरोध की लड़ाई भी कमतर नहीं। लेकिन इसका इतिहास क्या बता रहा है हमें। वे ही कॉरपोरेट जलजले जो पहाड़ को हिलाते हैं और डुबोते हैं। वे ही हम साथ हैं उत्तराखंड जैसे इमोश्नल लिलिजेपन के साथ टीवी कार्यक्रम पेश करते हैं और कई करोड़ जुटाकर उन्हें ही सौंप देते हैं जो नदियां बचाने की लड़ाई के मशहूर या किंचित मशहूर नाम हैं। उन्हें ही बीड़ा सौंपते हैं जो बड़े औद्योगिक घरानों की सीएसआर कार्रवाइयों के लिए निर्मित किए गए प्रतिष्ठान हैं। फिर ये लड़ाई अंजाम तक कैसे जाएगी। दुष्चक्र कैसे टूटेगा। क्योंकि इसकी घिर्री तो बांध की टरबाइनों से ज्यादा तेजी से घूम रही है। भरते रहिए कागज, जाते रहिए कोर्ट। करते रहिए शोध, कौन रूक रहा है।

एक थोड़ा तीखा सवाल और है। पहाड़ में ऐसा कोई आंदोलन बड़े बांधों के खिलाफ क्यों नहीं उठा जैसा नर्मदा पर मेधा पाटकर का रहा है। क्यों। टिहरी बांध से कितना विस्थापन और किनका पुनर्वास हो रहा है। कब तक जारी रहेगा। पहाड़ों को छलनी करने के लिए ठेकेदार और मजदूर बाहर से नहीं बुलाए गए थे। वे वहीं के लोग हैं। उत्तराखंड की जीडीपी की छलांगें उनसे आई हैं। जनता ने क्योंकर एक सीमा के बाद विरोध करना बंद किया। क्योंकर माना कि चलो देखा जाता है घरों के लड़के काम पर लगे हैं। चार पैसे आएंगे। आने दो। उनमें वैसी अदम्य भावना क्यों नहीं आई जैसी नियमागिरी के दस हज़ार आदिवासियों में आ गई। ये सही है कि प्रतिरोध के खिलाफ दमन भी उतना ही मुस्तैद रहता है और वो आंदोलनों को तोड़ता है लेकिन क्या आंदोलन समय के साथ इतने लचीले होते जाते हैं। अपनी ही कुदरत के बीच हम ही उसके खलनायक बन गए हैं।

जबकि हमारा ऐसा नाता नहीं था। पर्यटन को पूंजी से जोड़ा हमारी गरीबी का इतना निर्माण किया कि हमें अंतत: निर्माण के निवेश में ही उतरना पड़ा। होटल बनाए नदियों को कुचला जंगल काटे बीज हटाए खेत उजाड़े और अब सब तुम्हारे हवाले हैं। पहाड़ पर दमन भट्टियां धधक रही हैं। हमने प्रतिरोध की संस्कृति को डुबो दिया है। वो आग कबकी बुझ चुकी। अब ''मुछाळे'' (गढ़वाली शब्द-रोशनी और चूल्हे में आग जलाने के लिए चीड़ की गोंद वाली लकड़ी को जलाकर मशाल की तरह इस्तेमाल किया जाता है) लेकर बातों का विप्लव करते हो। रही सही आग को लालसा और महत्वाकांक्षा और नकली वीरता के तालाब में बुझा देते हो। ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के। कहां हैं वे मशालें कहां हैं वे लोग कहां हैं वे मेरे गांव। अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के। कैसी बदकिस्मती है हमारी कि ये लाइनें सरकारें गाती हैं। ठेकेदार आह्वान कर रहे हैं इन लाइनों के साथ। उन्होंने हमारी ही लाइनें लेकर उन्हें हमारी बरबादी के गान में बदल दिया है बल्ली।

हम विकास के इस मॉडल की भरपूर भत्र्सना करते हैं। और इसे मॉडल कहकर बेनेफ़िट ऑफ डाउट भी हम देना पसंद नहीं करेंगे। पहाड़ की लूटखसोट बंद करनी ही होगी। ये दमन बर्दाश्त नहीं है। लेकिन हम विरोध के उत्तरआधुनिक मॉडलों का भी पुरजोर विरोध करते हैं। कल्चरल भूमंडलीकरण और मास मीडिया की भव्यता में आयोजित भावनात्मक घिनौनेपन और उसके तत्वों की हम मुखालफत करते हैं। कॉरपोरेटी दया के मोहताज बने रहना हमें गवारा नहीं। हम दस्तावेजों और बहसों और सेमिनारों के ज़रिए बौद्धिक चमकीलेपन की जुगाड़ में रहने वाली शक्तियों से भी परिचित हैं और उन्हें बेपर्दा करने का निश्चय रखते हैं।

लड़ाई की और वेदना की एक पूरी की पूरी हिस्टॉरिक तफ्सील को धुंधला कर देने की एक बहुत शातिराना चाल की जा रही है। गैर माक्र्सवादी कुटिलता, एनजीओइम आस्था आस्था चिल्लाकर पर्यावरण पर्यावरण खेलकर नवसांप्रदायिकता के लिए जगह बनाने की फ़िराक है। पर्यावरण आने वाले दिनों में कोई आश्चर्य नहीं कि धर्म के खाते से आएगा। कथित आस्थावादी सबसे ज्यादा यही गाएंगें।

हक हकूक के मूल सवाल नहीं रहेंगे। पहाड़ कोई स्वप्निल जगह है क्या, पांव पड़ते ही देवत्व प्राप्त कर लेने की गुफा। हमारा घर है वो। हमारे खेत और लोग हैं वहाँ। ये कौनसे ईश्वर और कौनसे महाराज लेकर आ गए वे। हमारे पूर्वजों के पत्थर हिल रहे हैं, लुढ़क रहे हैं, नदी में जा रहे हैं, पहाड़ से हर किस्म की ये नाजायज़ कमाई बंद करो।

-शिवप्रसाद जोशी( पहल पत्रिका से साभार)

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हिलवाणी अच्छा है। इसे विकसित किया जाए तो बड़े काम का साइट हो जाएगा। थोड़ा फोटो फीचर बढ़ा दें। एक फोटो दस्तावेज़ हो सकता है। स्थानीय बोली की रचनाएं अच्छी लगती हैं।
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kamal ki site banayi hai...aisai manch ki sakht zaroorat thi...aur mitravar, aapkai saksham hathon mai hai isliye ummeedain bhi bandh rahi hain...jan,jangal, zameen kai sawal apsai badhiya kaun utha sakta hai... ...dhanonmukh patrakarita kai is yug mai janonmukh upkram ka parcham lahraya hai aapnai, aap samman ke bhagi hain, abhinandan kai patra hain.... ..pahad ke logon ki janvadi akankshaon ka gunjayman manch bane ye site,yahi kamna hai...badhai..
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हिलवाणी एक सजग और सुरूचिपूर्ण कोशिश है.
- शैलेश कुमार, बंगलौर

उत्तराखंड पर ढेरों साइट्स हैं, लेकिन सभी आधी-अधूरी। आपकी साइट इस गैप को भरती दिखती है। उम्मीद है आप पहाड़ की उन खबरों को भी तरजीह देंगे, जो आमतौर पर अखबारों से गायब दिखती हैं। साइट में ऑडियो फंक्शन जोरदार लगा।
- राकेश परमार, देहरादून

हिलवाणी एक बहुत ज्ञानवर्धक वेबसाइट है। यहाँ हमें उत्तराखंड से जुडी हुयी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। आपका प्रयास स्तुत्य है। बस एक सुझाव देना चाहता हूँ कि यहाँ आप कुछ आलेख गढ़वाली भाषा में भी डालें क्योंकि हमारी भाषा हमारी पहचान है। पहाड़ों कि संस्कृति बचानी है तो सबसे पहले हमारी भाषा को बचाना होगा। गुणानंद पथिक जी कि गढ़वाली कविता पढ़कर अच्छा लगा।
- साकेत बहुगुणा

good work. keep it up!
- अल्मा डबराल, दिल्ली

ये सराहनीय और सार्थक प्रयास है. गढ़वाल के रीति रिवाज व संस्कृति को और ज़्यादा प्रस्तुत करने की कोशिश हो तो बेहतर रहेगा.
- दर्शन सिंह रावत, देहरादून

हिलवाणी को देखकर सुखद अहसास हुआ. अच्छा लगा कि ये काम शुरू हो पाया है.
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Its good to see all our garhawal news are popping up here. It drives us towards our unforgettable memories. keep on putting your efforts so we can be updated same about our native irrespective of the part of world we are living.
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हिलवाणी के लिए हौसला बनाए रखना और स्तर बनाए रखना.
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काव्यात्मक और कलात्मकता की संजीदगी लिए हिलवाणी पहाड़ की ज़श्न-ए-आज़ादी जैसा हो. शुभकामनाएं.
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Hillwani is a very refreshing wbsite with all the ingredients that a good website must have. I came to know about it from one of my friends, and I'm happy to discover such a nice wesite. Keep up the good work.
- रवि शेखर, रांची

हिलवाणी को विस्तार से देखा. बहुत ख़ूबसूरत है. पहाड़ में हरियाली बहुत सुहाती है. दिन रात मारधाड़ या भाषण की ख़बरों से अलग इस तरह की चीज़ वाक़ई बहुत अच्छी लगी.
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साइट देखी. बढ़िया है. सुधार की गुंजाइश तो लगातार बनी रहती है. मुझे लगता है कि धीरे-दीरे कंटेंट बढ़ने पर और बेहतर होगी.
- प्रभाकर मणि तिवारी, कोलकाता

वेबसाइट अच्छी है. थोड़ी कलरफ़ुल कर दीजिए. अभी सादी लग रही है. बाक़ी शुरुआत अच्छी है.
- आभा मोंढें, बॉन

बहुत अच्छी है ये कोशिश. अच्छी लगी. दो पंक्तियों में चलता स्क्रोलर थोड़ा डिस्ट्रैक्ट कर रहा है. एक से ही काम चल सकता है.
- तस्लीम ख़ान, नई दिल्ली

हिलवाणी हमेशा गूंजती रहे. शुभकामनाएं.
- नवीन जोशी, नैनीताल

बहुत ही अच्‍छा प्रयास है सार्थक बनाये रखे.
- विमलेश गुप्‍ता, शाहजहांपुर

A timely, novel and positive effort indeed. Keep it up!
- सी के चंद्रमोहन, देहरादून

एक गंभीर प्रयास
- सचिन गौड़, बॉन

हिलवाणी के प्रयोग के लिए बधाई.
- ज़हूर आलम, नैनीताल

हिलवाणी के लिए बधाई और शुभकामनाएं
- वीरेन डंगवाल, बरेली

'हिलवाणी' बहुत अच्छी लगी - एक सुखद आश्चर्य जैसी. एक नज़र सभी पृष्ठ देख गया हूं. समाचार, कथा-कहानियां, कविताएं, साक्षात्कार, सभी कुछ तो है. बहुत सुंदर शुरुआत है.
- गुलशन मधुर, वाशिंगटन

ये वाकई बहुत अच्छी शुरुआत है. कम से कम मुझे अब ये पता चल पाया कि गुणानंद पथिक कौन थे. इसे लॉंच करने का शुक्रिया.
- दीपक डोभाल, वाशिंगटन

गिर्दा और विद्यासागर जी की आवाज़ सुनना ख़ास तौर से अच्छा लगा. मुझे विश्वास है हिलवाणी को पहाड़ की नई पुरानी पीढ़ियो का सक्रिय सहयोग और समर्थन मिलेगा.
- मंगलेश डबराल, दिल्ली

कंसेप्ट और कंटेंट बहुत अच्छा है. इन्हें बनाए रखें.
- रामदत्त त्रिपाठी, लखनऊ

वेबसाइट देखकर बहुत अच्छा लगा
- गोविंद सिंह, नई दिल्ली

वेबसाइट पसंद आई
- ललित मोहन जोशी, लंदन

अच्छी पहल, बधाई
- प्रोफ़ेसर गिरजेश पंत, देहरादून

बहुत बढ़िया शुरुआत. आला दर्जे की विविधता भरी सामग्री. बनाए रखें
- आनंद शर्मा, देहरादून

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