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सैर सैलानी
पर्यटन के हाशिए पर फैला हुआ आली बुग्याल
Posted on: 2012-10-31

उत्तराखण्ड में घाटियों से लेकर चोटियों तक प्रकृति ने अपने सौन्दर्य का खजाना खोला है।कल कल करती नदियां,घाटियो में बसी संस्कृति,हिमाच्छादित चोटियां और हरे भरे बुग्याल सैलानियों को बार बार देवभूमि में आने पर विवश करते है लेकिन राज्य सरकार और पर्यटन विभाग की उदासीनता के चलते कई पर्यटक स्थल अपनी पहचान के लिए तरस रहे है। सीमान्त जनपद चमोली गढवाल तीर्थाटन के साथ ही प्रकृति के अनमोल स्थलों को अपने में लिये है उन्हे में एक है नंदा देवी राजजात के पैदल मार्ग में स्थित आली बुग्याल.

हरी मखमली घास के ऊपर बादलों की चहलकदमी.बादलों के बीच सूरज की लूकाछूपी और मीलों तक फैला बुग्याल.....इसे आप धरती का स्वर्ग भी कह सकते है जी हां चमोली गढवाल यूं तो प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य को अपने में समेटे है लेकिन आली बुग्याल का नैसर्गिक सौन्दर्य सभी को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करता है।राजधानी देहरादून में ऋषिकेश बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर पहाडों के दीदार और अलकनन्दा की लहरों के बीच आप जैसे ही कर्णप्रयाग पहुचेंगे तो यही से आपका सफर आली बुग्याल के लिए शुरु हो जाएगा।

कर्णप्रयाग से ग्वाल्दम-बागेश्वर पिथौरागढ राष्ट्रीय राजमार्ग पर 70 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद आप देवाल पहुचेंगे जहां से करीब 22 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद वाण गांव पहुचेंगे।वाण गांव नंदा लोकजात और राजजात में अंतिम आबादी क्षेत्र है यहां से उच्च हिमालय क्षेत्र की सीमा शुरु हो जाती है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वाण गांव से मां भगवती बेटी से बहु के रुप में पूज्यनीय होती है यही से कैलाश क्षेत्र का ससुराल क्षेत्र भी शुरु हो जाता है।देवाल से वाण तक अभी मोटरमार्ग खस्ताहाल है और आपको सावधानी पूर्वक चलना होगा।नंदाराज 2013 के लिए इस मोटरमार्ग पर कार्य प्रगति पर है।

वाण गांव में मां नंदा देवी का धर्मभाई लाटू देवता प्राचीन सिद्वपीठ मंदिर स्थित है।मान्यता है कि नंदादेवी लोकजात और राजजात के दौरान लाटू देवता अपनी बहिन की अगुवाई करता है।घने देवदार के बीच स्थित लाटू देवता के प्राचीन मंदिर के पास ही वन विभाग और जीएमवीएन के विश्राम भवन भी स्थित है।समुद्र तल से 2500 मीटर की ऊचाईं पर स्थित वाण गांव में नंदाराज जात के दौरान 2013 में करीब पांच लाख श्रद्वालुओं और पर्यटकों की पहुचने की उम्मीद है।अलकनंदा और पिंडर नदी के संगम पर बसे कर्णप्रयाग से सीमान्त विकासखंड देवाल से बीस किमी सडक मार्ग के बाद वाण गांव से 13 किमी पैदल मार्ग से आली वुग्याल पहुचा जा सकता है।

वाण से जैसे ही आपके कदम आली बुग्याल की ओर बढ़ेगे आपको घने जंगलो के बीच से जाना होगा।बांज बुराश,कैल और फर्र प्रजातियों का करीब सात किलोमीटर का जंगल ट्रैक मिलेगा।जंगल ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए यह ट्रैक आत्मिक शांति और हिमालय की जैवविविधता को जानने के लिए सुन्दर ट्रैक है।रास्ते में कई छोटी जलधाराओं,वन्ज जीवों और पक्षियों का मधुर कलरव आपकों महानगरों की भागदौड भरी जिन्दगी आपको हिमालय के करीब होने का अहसास करायेगा।वाण से बेदनी बुग्याल की कुल दूरी करीब 12 किलोमीटर है और पूरा रास्ता घने जंगलों से होकर गुजरता है।

इस पूरे ट्रैक पर रणकीधार और गरोलीपातल नामक स्थान पडते है।गरोली पातल में मां भगवती की डोली रात्रि विश्राम के लिए रुकती है।घने बांज बुराश और देवदार के झुरमुटों के बीच गरोली पातल रमणीक स्थल है जहां रहने के लिए मात्र दो ही मकान है।नंदा राजजात और लोकजात के समय श्रद्वालु और पर्यटक बेदनी बुग्याल का रुख कर लेते है जो वहां से मात्र तीन किलोमीटर की दुरी पर स्थित है।बेदनी बुग्याल से जुडा है आली बुग्यालकरीब पांच किलोमीटर क्षेत्रफल से भी अधिक में फैला आली का दीदार कर आप भी मंत्रगुग्ध हो जाएंगे।

यह कुरदरी हरा घास का मैदान घोडे की पीठ की तरह नजर आता है जिसके चारों ओर विश्वस्तरीय स्कीईंग ढलान है और स्कीईंग के शौकीनों के लिए बेहतरीन स्की रिजार्ट बन सकता है।आली बुग्याल समुद्र तल से बारह हजार फीट की ऊचाई पर स्थित है।चारो तरफ घने बांज,बुरांश,खर्सू, और कैल के जंगलों से घिरा आली बुग्याल में जब आप सैर करेंगे तो आपको उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्नो और ट्रीलाईन का मिलन भी दिखाई देगा।बहुमूल्य जडी बूटियों और रंग बिरंगे फूलों से सजी इस टोकरी को आज भी इन्तजार है पर्यटन मानचित्र पर कब उसे स्थान मिलता है।

चमोली जिले में स्थित इस आली बुग्यालय के विकास के लिए स्थानीय लोग समय समय पर अपनी आवाज उठाते रहते है।जिला साहसिक एवं पर्यटन विकास अधिकारी एस एस राणा की ने बताया कि आली बुग्याल पर्यटन मानचित्र पर अंकित है।बुग्याल और वन विभाग की सीमा में होने के कारण वहां आधारभूत सुविधाओं मुहैय्या कराने में दिक्कत हो रही है।उन्होने कहा कि आली बुग्याल को एक सर्किट के रुप में प्रचारित किया जा रहा है।2013 में होने जा रही नंदाराज से आली बुग्याल को भी नई पहचान मिल सकेगी।एस एस राणा ने बताया कि आली बुग्याल के लिए वाण-बेदनी बुग्याल-आली बुग्याल –बांक गांव का सर्किट तैयार किया जा रहा है।

गढवाल सांसद सतपाल महाराज और पर्यटन मंत्री अमृता रावत ने भी वाण से आली बुग्याल तक रोपवे लगाने की घोषणा की है।आली बुग्याल में जोशीमठ के पास स्थित औली बुग्याल से भी बेहतरीन स्कीईंग स्लोप्स मौजूद है लेकिन सरकार की अनदेखी के चलते आली बुग्याल पहचान बनाने से पहले ही अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है।आली बेदनी बजनी बुग्याल संरक्षण समिति के अध्यक्ष दयाल सिंह पटवाल की बताते है बुग्यालों को बचाने के लिए राज्य सरकार ने आज तक कोई नीति नही बनाई।

बुग्याल स्थानीय पशुओं के चारागाह के साथ ही जलस्रोत के भंडार भी है।देवाल क्षेत्र में स्थित तीन बुग्याल में व्यावसायिक चुगान काफी बढ गया था।दयाल सिंह पटवाल कहते है बाहरी पर्यटक और श्रद्वालु बुग्यालों में प्रवास के दौरान बडी मात्रा में प्लास्टिक कचरा छोड देते है। पटवाल कहते है बुग्यालों में ठेकेदारी चुगान से काफी नुकसान हो रहा है क्योंकि बडी संख्या में घोडे खच्चर यहां चुगान करते है जिससे बुग्यालों की जैवविविधता पर संकट बढ रहा है.

औली बुग्याल विश्वस्तरीय स्कीईंग रिजार्ट के रुप में ऊभर चुका है लेकिन आली बुग्याल पर्यटन के मानचित्र पर भी नही उभर पाया। जबकि 1972 में क्षेत्रीय विधायक शेर सिंह दानू ने आली बुग्याल में विश्वस्तरीय स्कीईंग की संभावनाओं को देखते हुए इसे विकसित करने के लिए रोपवे लगाने का प्रस्ताव भेजा था।स्थानीय लोगो की माने तो चार दशक पहले अगर आली बुग्याल को विश्व मानचित्र पर पहचान दिलाई जाती तो वर्तमान में यह विश्वस्तरीय स्कीईंग सेन्टर के रुप में विख्यात हो जाता और इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार भी मिलता।

आली बुग्याल की खूबसूरती के विदेशी पर्यटक भी कायल है।बेदनी बुग्याल से लगा आली बुग्याल दुनिया के लिए अभी भी छुपा रहस्य है।कुलिंग गाव की रुपा देवी कहती है बाहरी सैलानी बुग्यालों में प्लास्टिक कचरा फैला देते है।उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित बेदनी और आली बुग्याल देश दुनिया में आकर्षण पैदा करते है।रुपा देवी कहती है स्थानीय स्तर पर ठेकेदारी चुगान पर नजर रखने के लिए महिलाओं ने कमर कस ली है।

कुलिंग गाव के धर्मवीर सिंह बिष्ट की माने तो नंदा राजजात और लोकजात जिन पड़ावों और गांवों से होकर गुजरती है उन्हे गांवों में सडक बिजली आज तक मुहैय्या नही हो पाई है।धर्मवीर बताते है विदेश और बंगाली पर्यटक आली की सुन्दरता को देख मंत्रमुग्ध हो जाते है अगर पर्यटन विभाग इस विकसित करे तो स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकेंगे।।बंगलूर से बेदनी बुग्याल होते हुए जब मार्श आली बुग्याल के ट्रैक पर पहुचें तो आली के दीदार को देख बस निहारते रहे।

मार्श ने कहा के कई बार वेदनी बुग्याल –रुपकुंड ट्रैक पर आये है लेकिन आली बुग्याल के ट्रैक पर पहली बार पहुचे है।मार्श ने कहा कि वे चालीस दल के साथ पिण्डारी ग्लेशियर निकल रहे है जो चालीस दिन का ट्रैक है।मार्श ने कहा कि यहां आकर लग रहा है जैसे किसी कलाकार ने बुग्याल,घने जंगलों और हिमालय के नयाभिराम शिखरों को किसी कैन्वास पर उतारा है।प्रकृति की सुन्दरता को देख वे आश्चर्य में पड़ गये।देश विदेश के सैलानी तो यहां पहुच ही रहे है लेकिन विडम्बना देखिये कि प्रदेश सरकार के पर्यटन मानचित्र पर ही इसे जगह नही मिली।

27 सितम्बर को विश्व पर्यटन दिवस राज्य सरकार बडे बडे सेमिनार और कार्यशाला आयोजित कर पर्यटन देहरादून में लाखों रुपये प्रदेश के पर्यटन के विकास के नाम पर ठिकाने लगा देती है और पर्यटन विकास की गतिविधियों को बढावा देने का दावा जरुर अधिकारी और मंत्री बडे मंचो से करते है।अमेरिका से वेदनी-आली बुग्याल के सुनहरे ट्रैक पर पहुची हैन्सी ने भी बताया कि वे उत्तराखंड कई बार पहुची है लेकिन आली नैसर्गिक सुन्दरता हिमालय के और करीब ले जाती है।

तो आप भी अगर आली बुग्याल की सैर पर जाना चाहते है तो फिर अगस्त से लेकर नवम्बर माह सबसे सही समय है जब आली बुग्याल में मखमली घास और कई जडी बूटियों आपको मदहोश कर देंगी।दिसम्बर से मार्च के बीच आली बुग्याल बर्फ की सफेद चादर ओढ लेता है।अगर आप स्कीईंग के शौकीन है और आली के बेहतरीन ढलानों पर स्कीईंग करना चाहते है आप दिसम्बर से मार्च के बीच आली आ सकते है।मार्च से जून तक का समय खुशनुमा रहता है मार्च अप्रैल में बुरांश के सुर्ख लाल फूलों से आपको अपने चारों ओर की पहाड़ियां किसी दुल्हन की तरह लगेगी।

आली बुग्याल का ये दिलचस्प यात्रा वृतांत हिलवाणी के लिए भेजा है युवा टीवी पत्रकार संदीप गुसाईं ने.

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Comments

UDIT NARAYAN SHARMA.2012-11-15 10:11 AM
bahaut bhadya likha hai sir aapne.

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