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कथा कविता
"वक्त आने में वक्त लगता है": अरुण कुकसाल का यात्रा वृतांत
Posted on: 2012-09-22

 प्रस्तुत यात्रा वृतांत या  कहें यात्रा संस्मरण हिलवाणी के लिए भेजा है लेखक अरुण कुकसाल ने जो उत्तराखंड में उधमिता विकास कार्यक्रम से जुड़े हैं. 


3 जून 2012

यात्रा सीजन में बस वालों के लिए लोकल सवारी दोयम दर्जे की हो जाती है। सोचा था, श्रीनगर से सुबह की पहली बस से सतपुली पहुंचेगे। वहां से गांव की ओर जीपें तो चलती रहती है। पता लगा दोपहर तक श्रीनगर- कोटद्वार मार्ग पर आजकल कोई सीधी बस सर्विस है ही नहीं। मजबूरन एक लोकल यात्री के नाते यात्रा सीजन में गाडियों की कमी की खीज से गुजरते हुए गांव जाने के लिए टैक्सी की षरण में जाना पड़ा। अपने गांव चामी में 4 जून को भैरवनाथ और 5 से 7 जून इष्टदेवी झालीमाली के मन्दिर में सात गावों की सामूहिक पूजा है। अपना चिन्तन बैक गियर लगाता है।

ज्यादा वक्त नहीं हुआ है, तीन दशक पहले तक प्रवासी लोग हर साल लम्बी छुट्टी लेकर अपने गांव जाते थे। खेती-बाड़ी, तीज-त्यौहार, शादी-ब्याह, मकान की मरम्मत आदि कामों को निपटाते हुये मजे से गांव में महीने दो महीने रहते। खेती-बाड़ी अब रही नहीं। गांव में तीज-त्यौहार मनाना बीते दिनों की बात हो गयी है। शादी-ब्याह में बहुत जरूरी हुआ तो एक रात शामिल होने आ गए। वैसे भी अधिकांश लोगों के कुटम्ब अलग-अलग शहरों में छितरा गए हैं। फिर गांव में रहेगें किसके पास ? मूल प्रश्न यह है।

ज्यादातर लोगों को तो पितृकुड़ी में पितृलोड़ी रखने के लिए ही गांव की याद आती है। एक कारण बड़ा मजबूत है, आज के दौर में गांव जाने का, देवी-देवताओं के सामूहिक पूजन में शामिल होना। और छुट्टियों का महीना जून इसके लिए निर्धारित सा लगता है। वैसे पिथौरागढ़ -चम्पावत से खबर आयी थी कि प्रवासी लोग स्थानीय देवी-देवताओं की मूर्तियां भी अपने साथ ले गए हैं। लो कर लो बात, हमेशा की छुट्टी पायी गांव आने से। श्रीनगर से चले तो ज्वालपा प्रातः 8 बजे पहुंचे। सड़क से ज्वालपा मन्दिर जाने का रास्ता अब ठीक-ठाक हो गया है।

किंवदन्ती है कि मां पार्वती ने इस स्थल पर ज्वाला के रूप में अपने भक्तों को दर्शन दिए थे। पश्चिमी नयार के दायें तट पर पौड़ी-कोटद्वार सड़क मार्ग में देवी का यह प्रसिद्ध धाम है। देवी दर्शन के बाद नयार नदी की ओर जाना हुआ। नयार का जन्मस्थान दूधातोली है। भूमिगत जलप्रवाह वाली चंचल नयार नदी को राठ, चैदंकोट और सलाण क्षेत्र की जीवनदायनी माना जाता है। नयार की मछलियां प्रसिद्ध हंै। लेकिन आज नयार कमजोर, बीमार, गुमसुम, अपने आप में सिमटी पतली लकीर सी बहती नजर आ रही है। गर्मियों में इसका पानी कम जरूर होता है, परन्तु इतना कम,विश्वास नहीं होता। हे ईश्वर! जल्दी बारिश हो, कुछ तो स्वास्थ्य सुधरे नयार का। आगे बढ़े, तो ज्वालपा पुल पार करते ही चैंदकोट जनशक्ति मार्ग के द्वार पर निगाह जाती है।

टीनू को बताता हूं कि पचास के दशक में चैंदकोट की चार पट्टियों को मिलाती 56 कि.मी. की इस सड़क को स्थानीय लोगों ने बनाया था। लगातार 3 साल तक चैंदकोट और राठ की जनता ने इसके लिए श्रमदान किया था। कितनी प्रबल रही होगी उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और सामूहिक उद्यमशीलता। पाटीसैंण पहुंचने से पहले ही गांव से मोबाइल पर बताया गया कि सब्जी और दूध लेते आना। दूध लाना मत भूलना वो भी पाउडर वाला। लिहाजा पाटीसैंण से आलू, टमाटर, लौकी, बैंगन, भिन्ड़ी़़़़़़़.........़... आदि से भरे थैले, दूध के डि़ब्बे और भी बहुत कुछ गाड़ी में ठूंस दिये गये हैं। कोटद्वारी सब्जी एवं राशन से लक-दक होकर हम चलें गांव की ओर। पाटीसैंण से बौसाल और वहां से हमें नयार पर बने पुल से भेटी-कल्जीखाल सड़क पर जाना है।

खड़बड़-खड़बड़ की आवाज वाला यह पुल देसी जुगाड़ का दिलचस्प नमूना है। पुल पर पैदल चलना ही जोखिम भरा है। लोग करें भी तो क्या करें। कब तक और कहां तक गुहार लगायें। काम चल ही रहा है। मोटर पुल से लगा पुराना पैदल पुल भी है। पूरी मजबूती के साथ सीना ताने। लगभग 70 साल पहले क्षेत्र के लोगों ने अपने संसाधनों और श्रमदान के बल पर इस पुल को बनाया था। आज उसकी आधी उम्र से भी के मोटर पुल के टूटे पट्टों को बदलने की भी कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। सरकार करेगी बल, हम क्यों करें ? नयार नदी के दोनों ओर के जंगलों में कई दिनों से लगी आग ने तपिश बड़ा दी है। लकडी, खरपतवार, कीडे़-मकोडे़, जंगली जीव-जन्तु और मिट्टी के जलने से फैली धुन्ध की तीखी गन्ध ने वातावरण को विषैला कर दिया है।

मरगांव, पीपला, डुंक, जैथलगांव, बलिणगांव के बाद है चमधार। मोटर सडक के आस-पास के इन गांवों में भी सड़क से चिपक कर रहने की प्रवृत्ति बड़ रही है। जब भी गांव आता हूं नीचे दुकान ऊपर मकान या आगे दुकान पीछे मकान वाले कई नए भवनों की कतार दिखाई देती है। गांवों में शहरी जीवन शैली को पसारने में इनका भी योगदान है। चमधार में गांव के कई बच्चे सामान लेने पहले ही पहंुचे है। सार्मथ्यवार जो सामान हाथ आया उठाकर गांव की ओर अपने ही बनाये र्शाटकट रास्तों से दौड पडे हैं। खाली एवं सूखे खेतों से चलते हुए बड़ती उमस के कारण गर्म धूल उडने लगी है।

मनरेगा में बना खंडजा और दीवारबन्दी गांव में हुए नए विकास कार्यों का संकेत दे रहा है। भूख और थकान में कौन ज्यादा है, बता नहीं सकते परन्तु ये दोनों एक दूसरे को और बड़ाने में जरूर मददगार साबित हो रहें है। घर के पास पहुचां, आदतन आम के पेड़ की ओर देखा, खूब फला है इस बार। मन खुश हो गया। टीनू तो गांव के बडे- बुर्जगों को फ्लाइंग प्रणाम करता हुआ सीधे खरगोश, मुर्गी, गाय, बकरी ......आदि की खबरसार लेने उनके ठिकानों की ओर दौड पड़ा है। गांव में मेहमानों का आना जारी है। थोड़ी-थोड़ी देर में बच्चे खबर लाते हैं कि तल्ला, मल्ला, विचला, पल्ला खोला से कौन-कौन गांव आ गए हैं। रात का खाना पूरे गांव का एकसाथ है।

अतः आपसी कुशल क्षेम के साथ खाना बनाने की तैयारियां भी साथ-साथ चलने लगी हैं। देश-जहान की बातें चर्चाओं में हैं। हर एक के पास कुछ न कुछ कहने को है। पुरूषों की बातचीत में हालिया राजनैतिक उठापटक के किस्से हैं। महिलायें घर-परिवार, बच्चे, और खेतीबाड़ी की बातों में मशगूल हैं। महिलायें इसीलिए व्यावहारिक जीवन के ज्यादा निकट होती हैं। इस पूरे माहौल में किशोरवय के युवा भी हैं। थोड़ा शंकित और अचरज का भाव लिए अपने ही परिवारवालों के आस-पास चुपचाप से। कानों में एअरफोन लगाये। मुस्कराते भी हैं तो लगता है जैसे बड़ी मेहरबानी कर दी हो आप पर।

4 जून 2012

आज भैरवनाथ जी की सालाना पूजा है। बरसों से मनाई जा रही इस पूजा को तीन साल पहले और व्यापक एवं व्यवस्थित रूप दिया गया । इन्हीं प्रयासों का फल है कि इस बार गांव के सभी परिवारों की इसमें भागीदारी है। गांव में सामूहिक कार्यों को करने की सुविधा के लिए एक संयुक्त बैंक खाता है। इसमें सभी अपना योगदान जमा करते हैं। यह खाता अब तो बहुउपयोगी होने लगा है। गांव में देवी-देवता की भेंट, उच्चयांणा(मनौती), शादी का न्यूता, या फिर अन्य कार्यों हेतु गांव में धनराशि भेजने में मददगार साबित हो रहा है।

मात्र सूचना भर से जमा धनराशि टक से सम्बधित के पास पहुंच जाती है। इसी प्रकार यह निर्णय लिया गया था कि गांव में कोई भी मकान टूटा न रहे। गांव में रहो या न रहो। इसी अपील का नतीजा है कि पिछले दो सालों में पुश्तैनी मकानों की मरम्मत के प्रति लोगों की सक्रियता बढ़ी है। गांव की युवा पीढी की यह पहल भी है कि खाली मकानों/घरों का उपयोग सामुदायिक कार्यों के लिए किया जाए। गांव की रौनक लौट आयी है। चार दिन के लिए ही सही। गांव के धारे में सुबह से ही भीड है। धारे में नहाना सबकी पहली पसंद जो है। धारे का पानी हौज में जमा होता है।

जमा पानी सिंचाई के काम आता है। हौज में गाद भरी है। खेती कम हो गयी है, इसलिए सिंचाई के लिए हौज के पानी की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती। कभी यह हौज पानी से लबालब भरा रहता था। आज अनायास ही बचपन की कई यादें उसमें गोता लगा रही हैं। हौज में उतरने एवं बाहर आने के लिए खड़ा किया गया पत्थर आज भी अपने स्थान पर तैनात हैं। बच्चे नहीं आते उसके कन्धों पर उतरने-चढ़ने के लिए तो इसमें उसका कसूर नहीं है। गांव के प्रधान महावीर जी की उपस्थिति में तय हुआ कि इस बार दशहरों में हौज की सफाई के लिए सब जुटेगें। मन सन्तुष्ट हुआ, कि चलो कुछ तो बात आगे बढी। धारे में नहाने के बाद वापसी में चलते हुए किसी ने पूछ लिया गेहूं कितना हुआ तुम्हारा ? धाराप्रवाह सुनने को मिला।

‘अब क्या बताना ? हमारा 25 किलो तो किसी का 10 किलो भी नहीं हुआ। पूरे गांव में 3 बोरे गेहूं हुआ होगा। बीज भी हाथ नहीं आया। जानवरों के लिए घास तो होता। समय पर पानी नहीं बरसा। थोड़ा बहुत फसल जमीं भी थी, वह जंगली जानवरों ने चैपट कर दी। जंगलों में खाने को है नहीं। जानवर जाएं तो जाएं कहां। भरी दोपहरी में बेरोकटोेक घर की दहलीज पर मजे से आने लगे हैं। यह बताने कि हमारे लिए भी खाना बना देना। जानवरों से खुद को बचायें कि खेती को। पहले सभी खेती करते थे तो जानवरों से सामूहिक सुरक्षा हो जाती थी।

आज जिसने हल चला कर अपने खेत को लाल किया है, उसी को तो परेशानी होगी। बगल के बंजर खेत वाला चण्डीगढ, देहरादून, दिल्ली, मुम्बई, मेरठ, फरीदाबाद से तो आयेगा नहीं। अब बंदर-सुअर जंगली न होकर गांव के स्थाई निवासी हो गये हैं। आदमियों की आबादी से अधिक बंदर लोट रहें हैं गावों में। सलाह है कि उनका भी राशनकार्ड बनाया जाय। एक बात और बतायें जंगलों में लोग आग इसलिए भी लगा रहें हैं ताकि जंगली जानवर गांव के नजदीक न आ सकें।’ ‘ये तो ठीक बात नहीं है,’ किसी ने कहा। तुरन्त उत्तर आया। ‘दो-चार महीने गांव में रह लो। सब ठीक लगने लगेगा।’

पूजा का प्रसाद तैयार हो गया है। भैरवनाथ, शिवालय, हनुमान एवं नार्गजा मन्दिर में प्रसाद चढेगा। रुउली में सिद्धनाथ भैरव एवं शिव का मन्दिर है। सिद्धनाथ भैरव की नवीन मूर्ति की स्थापना 27 नवम्बर 2010 को हुयी थी। गोपेश्वर के नजदीकी गांव क्वोंज के आशा लाल जी इसके मूर्तिकार हैं। स्थानीय काले पत्थर की बनी इस मूर्ति में दो साल में ही गजब का निखार आ गया है। रुउली क्षेत्र आज गोचर रह गया है। कभी दाल, मंडुवा और झंगोरा की अच्छी पैदावार यहां होती थी। जाडों में गोट लगती थी तो हम बच्चों के दिन भर की धूमाचैकडी यहीं रहती। बहुत पहले कभी इस क्षेत्र में बसावत भी थी।

टिहरी रियासत के क्रान्तिकारी किसान नेता दादा दौलत राम के पूर्वज यहीं से पैन्यूला (दुगड्डा-टिहरी) गांव में जा बसे थे। शिवालय से कालभैरव और उसके बाद नार्गजा पंहुचें है। नार्गजा ईष्टदेव हैं। नार्गजा मन्दिर से लगी पितृकुड़ी है। परलोक सिधार गये परिजनों की स्मृतियां यहां पर सजीव हो जाती हैं। आज की पूजा गांव के हनुमान मन्दिर में पूर्ण होती है। गांव के सबसे बुर्जुग 96 वर्षीय श्री तोता राम जी बीमार हैं। सभी लोग पूजा के बाद उनके घर आशीर्वाद लेने पहुचें हैं। रेखा भाभी उनकी सेवा में दिन-रात तत्पर हैं। उन्हें यह भी चिन्ता है कि सेम-मुखीम यात्रा की मनौती हर साल टलती जा रही है। ‘नार्गजा सबकी रक्षा करेगें’ और जल्दी ही सेम-मुखीम की यात्रा होगी। यही सबके मन में है।

5 जून 2012

आज से खुगश, कण्डार, किनगोडी, उण्यूं, सिलण, लयड, और चामी गांव की झालीमाली मन्दिर में 3 दिवसीय सामूहिक पूजा है। वहां जाने के लिए 2 कि.मी. की तड़तड़ी पैदल चढ़ाई है। सुबह ही पहुंच गए कण्डारपानी। यहीं से ध्वजा मन्दिर के लिए प्रस्थान करेगी। कोटद्वार से सारा राशन एवं सब्जी कल शाम ही पहुंच गया था। कोटद्वार में व्यापार के साथ गढवाली व्यजनों पर कार्य कर रहे कण्डार गांव के राजेश जी ने पूरी राशन दानस्वरूप प्रदान की है। कण्डारपानी में प्राइमरी स्कूल, संकुल केन्द्र, थोडी दूर पर जनता इण्टर कालेज एवं कुछ दुकानें हैं।

मेले के कारण दुकानें सुबह ही खुल गयी हैं। तेजी से बडती चहल-पहल में शहरों से आये लोग ज्यादा हैं। दुकानों में बिस्कुट,चाकलेट, टाफी, कुरकुरे, शैंप,ू कोल्डड्रिंक, चुंयगम से लेकर रिचार्ज कूपन तक उपलब्ध है। अधिकतर सामानों में प्रचलित ब्राण्ड के नामों को थोड़ा सा बदला गया है। किसी से पूछा कि कोई स्थानीय उपज या उत्पाद बिक्री के लिए है। दुकानदार जी ने सोचना शुरू किया पर काफी देर बाद कुछ नहीं का ही उत्तर मिला। मन्दिर की ओर कटकटी चढाई में अपने आपसे बराबर संवाद चलता रहा कि इस पूरे आयोजन में ऐसा क्या है जिसे हमने स्थानीय स्तर पर पैदा या निर्मित किया है।

नहीें के बराबर है हमारी स्थानीय/ग्रामीण आर्थिकी का योगदान। फूल भी कोटद्वार से आ रहें हैं। मन्दिर पहुंचने पर पता चला कि जहरीखाल के पास फलिण्डा गांव से 90 वर्षीय बलदेव प्रसाद जी मात्र एक सूचना पर अकेले ही बस से इस पूजा उत्सव में भाग लेने कल शाम पहुंच गये थे। वे न किसी को जानते हैं और न ही कभी इस इलाके की ओर उनका आना हुआ। धन्य है उनकी श्रृद्धा। सुझाव दिया गया कि श्री बलदेव प्रसाद जी को परम सम्मान देते हुए पूजा के शुभारम्भ का प्रमुख यजमान घोषित किया जाय। वाह ! क्या बात कही कह कर सबकी सहमति तुरन्त मिल जाती है।

आपसी भाईचारा एवं अतिथि देवो भवः की भावना को सामने होते देख बडा आनन्द मिला। हजारों भक्तों के गगनचुम्भी जयकारों के साथ ध्वजा को ले जाने का उल्लास चहुंओर है। पचासों कैमरे, हैण्डीकैम्ब, और मोबाइल इस अदभुत दृश्य को कैद करने में तल्लीन है। किस-किस तरफ अपना कैमरा घुमायें। क्या -क्या जो देखें। भीड़ का जोश और आगे बड़ने की होड़। न टोकने वाला, न कोई रोकने वाला। न नियत्रंण, न पहरा, न डण्डा, न सीटी फिर भी सब मर्यादित, स्वःअनुशासित। मन्दिर परिसर में पहंुचते ही नाचती-गाती भीड़ का जोश बुलन्दियों पर है। भक्तों पर देवी-देवताओं का अवतरण होने लगा है।

झालीमाली, नृसिंह, नार्गजा, भैरव, हनुमान जी के भावों को उच्चारित करते देवी-देवताओं के नृत्यों की ओर सब लोग हाथ जोड़े मनौती की मुद्रा में हैं। अवतरित देवी-देवताओं के आशीर्वाद लेने धूप-अक्षत लिए लोगों के कई घेरे बनने लगे हैं। जहां-जहां तक दृष्टि जाती है, चारों ओर खेतों एवं छोटी-छोटी पहाडियों पर लोग ही लोग हैं। रोज की दुनियादारी से दूर। कई सालों बाद मिले दोस्तों, नाते-रिश्तेदारों से मिलने की छपछपी। एक से अभी बात पूरी हुयी नहीं कि अचानक बचपन का कोई मित्र दिख गया। बरसों बाद मिली हैं सहेलियां, खुशी के आसूं तो आयेगें ही।

व्यवस्था कार्य से लगे नवयुवकों की स्फूर्ति देखने लायक हैं। बीसियोें बार नीचे कण्डारपानी सामान लाने चट से गए और फट से आ गए। चेहरे पर आया पसीना पौंछा भी नहीं था कि किसी बडे बर्जुग ने दूसरे काम के लिए कहीं और दौड़ा दिया। सामुहिक कार्यों के प्रति यह तत्परता ग्रामीण युवाओं की पहली पहचान है। हाईस्कूल/इण्टर पास ये युवा रोजगार के घनघोर संकट से गुजर रहें हैं। उनके परिवार आर्थिक दिक्कतों में हैं। खेती-बाडी से गुजारा करना कठिन है। गांव में मार्गदर्शन करने वाला कोई है नहीं। न शहरों में अपना कोई ठौर-ठिकाना। जायें तो जायें कहां ? करें तो करें क्या ? परन्तु इस समय इन विकट चिन्ताओं को दरकिनार करते हुए वे सब अपनी-अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद हैं। शाम ढलने को आयी। पूजा के बाद भजन कीर्तनों का दौर देर रात तक चलता रहा। दिव्य शिखर में पूर्णमासी की रात को रहने का रोमांच मन को पुलकित करता है।

पूर्णमासी का चांद अपनी पूर्ण भव्यता में है। यहां से चैंदकोट, ज्वालपा, भैरवगढी, असवालस्यूं, मनियारस्यूं, मुण्डेश्वर, कालो का डांडा और दूर राठ क्षेत्र के गांव/इलाकों की बिजली की टिमटिमाहट नजर आती है। मानो तारों का एक संसार धरती पर भी है। जानकार साथी गांवों के नाम बताते जा रहें हैं। परन्तु मुझे मालूम हैै, सुबह होने तक इन नामों को मैं भूल जाऊंगा। सुबह जल्दी उठना है, ये सोचकर मन्दिर के पीछे वाले कमरे में राशन, सब्जी के बोरों, टोकरों, थैलों और बर्तनों के बीच लेटने की सुविधाजनक जगह बना ही लेता हूं।

6 जून 2012

सुबह तड़के ही मूल गांव खुगश की ओर निकल पड़ा। जले-भुने जंगल से गुजरते हुए प्रातःकाल की ताजगी का आभास होता ही नहीं। चीड़ के जंगल में जला पिरुल ज्यादा ही फिसलन करता है। खुगश इस क्षेत्र के सबसे पुराने गावों में है। गांव में हरि प्रसाद जी से परिचय होता है। मेरठ से कुछ दिनों के लिए अपने गांव आये हैं। मेरे लिए उनसे आदि गांव खुगश के इर्द-गिर्द के खण्डहरों में समाई किस्से-कहानियों को सुनते हुए मानवीय बसावत के शुरुवाती अन्दाज को समझना एक नये तरह का अनुभव है। मन्दिर से मंत्रोचार की ध्वनि सुनाई दी तो वापसी के कदम तेज होने लगे हैं। दूर-दूर से लोगों के हजूम मन्दिर की ओर आ रहें हैं। आज भीड़ कल से ज्यादा है। परन्तु व्यवस्थायें अपना आकार स्वयं ले रही हैं।

देवी दर्शन के बाद जहां सुविधाजनक जगह मिली वहीं झुण्ड बना कर लोगों की गप्प-शप्प शुरू होने लगी। साहित्यकार राजा खुगशाल, गणेश खुगशाल ‘गणि’ और तमाम लोगों के साथ बातचीत का सिलसिला चला तो चलता रहा। बात पर बात आगे बडती जाती है। सयाने बताते हैं कि इस ऊंचे एवं लम्बे चैडे स्थल पर चीन युद्व के बाद 1963 में केन्द्र सरकार द्वारा एयरोड्रम बनाने की योजना थी। काफी समय तक इसकी चर्चा रही। फिर पता नहीेे कहां फुर्र हो गयी यह योजना। आस-पास के गावों के ख्यातिप्राप्त व्यक्तित्वों पर कई जानकारियां सार्वजनिक होती हैं।

पास के सीरों गांव के प्रसिद्व अन्वेषक एवं उद्यमी अमर सिंह रावत ने 1936 में चमधार में पवनचक्की का सफल प्रयोग किया था। रामबांस, भीमल, कण्डाली के रेशों से स्वः निर्मित जैकेट को उन्होंने जवाहर लाल नेहरू को भेंट स्वरूप पहनाया गया था। स्व0 रावत ने स्थानीय संसाधनों से कई अन्य उत्पादों का निर्माण किया। परन्तु अपेक्षित सहयोग न मिलने के कारण वे रीते ही इस दुनिया से अलविदा हो गए। सामने के गांव सूला में चकबन्दी पर अग्रणी कार्य करने वाले गणेश सिंह ‘गरीब’ और सांगुडा के उद्यानपति विद्यादत्त शर्मा उद्यमशीलता की अलख जगाये हुये हैं।

युवा पीढ़ी इनके प्रयासों को आगे बढ़ाये तभी बात बनेगी। सामने ही डंगी गांव है। साहित्यकार स्व0 अनुसूया प्रसाद डुकलाण जी का गांव। ‘रूपकुण्ड का खोजी’ एवं ‘ज्योति किरण’ उनकी लोकप्रिय रचनायें हैं। चर्चा में उनके अप्रकाशित साहित्य को प्रकाशित करने पर सामूहिक सहमति बनती है। जलते जंगलों की दशा पर सबकी चिन्ता जाहिर होती है। गांव और जंगल के घनिष्ठ आत्मीय रिश्तों में ये बेगानापन कैसे आ गया ? तरह-तरह के मत हैं। जबसे जंगलों में ग्रामीणों के हक-हकूकों को समाप्त किया गया, तभी से जंगलों को बचाने के लिए ग्रामीणों की निष्क्रियता सामने आयी है।

ग्रामीणों की बदलती जीवनशैली ने वनों पर निर्भरता को कम किया है। लकडी-घास किसके लिए लाना है? खाना बनाने के लिए गैस हो गयी है। पशु गिने-चुने हैं। लकडी का मकान बनाना संम्भव नहीं है। तब जंगल बचाने की किसको पड़ी है? जले तो जले हमें क्या? परन्तु यह समझना होगा जंगल का जलना केवल पेड-पौधों का जलना मात्र नहीं है। एक नये संसार की भ्रूण हत्या करने जैसा है। हम वास्तव में जीवजगत और प्रकृति के बीच के सह अस्तित्व को ही नष्ट करने पर तुले हैं। आज के दिन इसी तरह की अच्छी खासी चलती-फिरती गोष्ठियां देर शाम तक चलती रहीं।

7 जून 2012

पूजा उत्सव में आने वाले युवाओं में मुकेश एवं योगेश दिल्ली से तो विकास देहरादून से हैं। तीनों ठीक-ठाक कमा लेते हैं। अपने-अपने क्षेत्र में उन्होने पहचान भी बनायी हैं। पहली बार मिले ये युवा कल से इस ओर सामूहिक चिन्तन कर रहे हैं कि किस प्रकार ग्रामीण युवाओं को सम्मानजनक रोजगार से जोडा जाय। गांवों में कम्प्यूटर साक्षरता की योजना का इन्होने प्रारम्भिक प्रारूप तैयार किया है। ‘साल में 30 दिन अपने गांव के लिए’ इनका स्लोगन है। मुझे विश्वास है, इन युवाओं की यह पहल भविष्य के नये आयामों के द्वार खोलेगी।

अभी इनके चिन्तन में थोड़ी हिचकिचाहट की छाया है, पर समय के साथ यह कुहासा भी छटेगा। देवी पूजन, हवन, और दोपहर के सामूहिक भोजन सम्पन्न होने तक शाम के 3 बज गये हैं। विदा होने से पहले बातचीत का एक दौर और होना है। यह उत्साहजनक है कि युवा एवं महिलाओं की उपस्थिति एवं सक्रियता इस संवाद में अधिक प्रभावी है। सफल आयोजन के सन्तुष्टि का भाव सबके चेहरे पर है। बैठक में इस स्थल को एक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में विकसित करने के लिए सार्थक सुझाव सामने आए हैं।

तय किया गया आगामी 50 साल बाद की परिकल्पना को लक्ष्य मानते हुए एक मास्टर प्लान तैयार किया जाए। इस दिशा में सर्वप्रथम पहल करते हुए गणेश खुगशाल, जर्नाधन प्रसाद एवं मनोहर लाल जी ने मन्दिर परिसर से लगी अपनी पैतृक भूमि को दानस्वरूप देने की घोषणा की। सभा के सर्वसम्मति प्रस्ताव के रूप में यह तय किया गया कि झालीमाली मन्दिर में किसी भी प्रकार की पशुबलि का निषेध रहेगा, अनुष्ठानों में प्लास्टिक का उपयोग नहीं किया जायेगा तथा झालीमाली मन्दिर परिसर में इस इलाके के सर्वागींण विकास के दृष्टिगत प्रत्येक वर्ष 1 से 10 जून के मध्य 3 दिवसीय पूजा उत्सव आयोजित किया जायेगा।

देर रात अपने युवा साथियों के साथ वापस अपने गांव आते हुए यह विचार मन में प्रबलता से आता कि ऐसा आयोजन कई साल पहले से होते रहते तो उसके सार्थक परिणाम भी सामने आ गए होते। पर तुरन्त गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ की यह पक्तियां याद आ गयी ‘वक्त आने में वक्त लगता है’ और मैं चलते हुए एक और ही कविता गुनगुनाने लगता हूं ‘तब मैं खूब हंसा, खुद अपने ऊपर, शुभ घडी तो कब से खड़ी थी द्वार पर और देरी मेरे भीतर’ देर से ही सही एक नयी शरुआत तो हुयी कहीं से।

अरुण कुकसाल
निकट-डाक बगंला, बुघाणी रोड़, श्रीनगर (गढ़वाल) 246174 मोबाइल नं.: 9412921293


उपरोक्त तस्वीर  panoramio.com  से साभार.

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Comments

chandrashekhar tewari2012-09-24 04:31 AM
bahut sundar yatra sansmaran hai. pahad ko janne samjhane ke liye esi jaroor padhana chahiye.
मनु पंवा2012-09-29 06:43 AM
दिदा, तुमारा लिखा पढ़ के छपछपी पड़ गई भै. जुगराज रयां।

मनु पंवार
दिल्ली

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एक पहाड़ी इ-पत्रिका के रूप में हिलवाणी का आना अच्छा लगा
- हेमचंद्र बहुगुणा, दिल्ली

हिलवाणी पहाड़ के सरोकारों, उम्मीदों और लक्ष्यों को सार्थक तरीके से सामने लाने की एक पेशेवर कोशिश बनी रहे, ऐसी कामना है
- रामदत्त त्रिपाठी, लखनऊ

i visted hillwani recently and find it very interesting and full of knowledge not only about news and views on my Motherland Uttarakhand but also about the major issues and problems of this Himalayan state.
- गीतेश नेगी, सिंगापुर

hillwani as VIBGYOR on mountains
- भास्कर उप्रेती, देहरादून

हिलवाणी के लिये बधाई.पहाड़ के लोगों को अपनी धरती से प्यार है.मुझे इससे काफी आशाएं हैं.
- शुभ्रांशु चौधरी,छ्त्तीसगढ़

हिलवाणी अच्छा है। इसे विकसित किया जाए तो बड़े काम का साइट हो जाएगा। थोड़ा फोटो फीचर बढ़ा दें। एक फोटो दस्तावेज़ हो सकता है। स्थानीय बोली की रचनाएं अच्छी लगती हैं।
- रवीश कुमार, दिल्ली

kamal ki site banayi hai...aisai manch ki sakht zaroorat thi...aur mitravar, aapkai saksham hathon mai hai isliye ummeedain bhi bandh rahi hain...jan,jangal, zameen kai sawal apsai badhiya kaun utha sakta hai... ...dhanonmukh patrakarita kai is yug mai janonmukh upkram ka parcham lahraya hai aapnai, aap samman ke bhagi hain, abhinandan kai patra hain.... ..pahad ke logon ki janvadi akankshaon ka gunjayman manch bane ye site,yahi kamna hai...badhai..
- प्रभात डबराल, दिल्ली

हिलवाणी एक सजग और सुरूचिपूर्ण कोशिश है.
- शैलेश कुमार, बंगलौर

उत्तराखंड पर ढेरों साइट्स हैं, लेकिन सभी आधी-अधूरी। आपकी साइट इस गैप को भरती दिखती है। उम्मीद है आप पहाड़ की उन खबरों को भी तरजीह देंगे, जो आमतौर पर अखबारों से गायब दिखती हैं। साइट में ऑडियो फंक्शन जोरदार लगा।
- राकेश परमार, देहरादून

हिलवाणी एक बहुत ज्ञानवर्धक वेबसाइट है। यहाँ हमें उत्तराखंड से जुडी हुयी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। आपका प्रयास स्तुत्य है। बस एक सुझाव देना चाहता हूँ कि यहाँ आप कुछ आलेख गढ़वाली भाषा में भी डालें क्योंकि हमारी भाषा हमारी पहचान है। पहाड़ों कि संस्कृति बचानी है तो सबसे पहले हमारी भाषा को बचाना होगा। गुणानंद पथिक जी कि गढ़वाली कविता पढ़कर अच्छा लगा।
- साकेत बहुगुणा

good work. keep it up!
- अल्मा डबराल, दिल्ली

ये सराहनीय और सार्थक प्रयास है. गढ़वाल के रीति रिवाज व संस्कृति को और ज़्यादा प्रस्तुत करने की कोशिश हो तो बेहतर रहेगा.
- दर्शन सिंह रावत, देहरादून

हिलवाणी को देखकर सुखद अहसास हुआ. अच्छा लगा कि ये काम शुरू हो पाया है.
- जगमोहन आज़ाद, नोएडा

Its good to see all our garhawal news are popping up here. It drives us towards our unforgettable memories. keep on putting your efforts so we can be updated same about our native irrespective of the part of world we are living.
- अविनाश नौटियाल

हिलवाणी के लिए हौसला बनाए रखना और स्तर बनाए रखना.
- लोकेश नवानी, देहरादून

It is a very nice portal. I could find all recent news about uttarakhand on it. And the articles were also good. Specially the "Yuva corner"
- सौरभ गर्ग, नई दिल्ली

The site appears awesome.
- लोकेश ओहरी, हाइडेलबर्ग

काव्यात्मक और कलात्मकता की संजीदगी लिए हिलवाणी पहाड़ की ज़श्न-ए-आज़ादी जैसा हो. शुभकामनाएं.
- प्रमोद कौंसवाल, दिल्ली

Hillwani is a very refreshing wbsite with all the ingredients that a good website must have. I came to know about it from one of my friends, and I'm happy to discover such a nice wesite. Keep up the good work.
- रवि शेखर, रांची

हिलवाणी को विस्तार से देखा. बहुत ख़ूबसूरत है. पहाड़ में हरियाली बहुत सुहाती है. दिन रात मारधाड़ या भाषण की ख़बरों से अलग इस तरह की चीज़ वाक़ई बहुत अच्छी लगी.
- मोहम्मद समी अहमद, मुज़फ़्फ़रपुर

साइट देखी. बढ़िया है. सुधार की गुंजाइश तो लगातार बनी रहती है. मुझे लगता है कि धीरे-दीरे कंटेंट बढ़ने पर और बेहतर होगी.
- प्रभाकर मणि तिवारी, कोलकाता

वेबसाइट अच्छी है. थोड़ी कलरफ़ुल कर दीजिए. अभी सादी लग रही है. बाक़ी शुरुआत अच्छी है.
- आभा मोंढें, बॉन

बहुत अच्छी है ये कोशिश. अच्छी लगी. दो पंक्तियों में चलता स्क्रोलर थोड़ा डिस्ट्रैक्ट कर रहा है. एक से ही काम चल सकता है.
- तस्लीम ख़ान, नई दिल्ली

हिलवाणी हमेशा गूंजती रहे. शुभकामनाएं.
- नवीन जोशी, नैनीताल

बहुत ही अच्‍छा प्रयास है सार्थक बनाये रखे.
- विमलेश गुप्‍ता, शाहजहांपुर

A timely, novel and positive effort indeed. Keep it up!
- सी के चंद्रमोहन, देहरादून

एक गंभीर प्रयास
- सचिन गौड़, बॉन

हिलवाणी के प्रयोग के लिए बधाई.
- ज़हूर आलम, नैनीताल

हिलवाणी के लिए बधाई और शुभकामनाएं
- वीरेन डंगवाल, बरेली

'हिलवाणी' बहुत अच्छी लगी - एक सुखद आश्चर्य जैसी. एक नज़र सभी पृष्ठ देख गया हूं. समाचार, कथा-कहानियां, कविताएं, साक्षात्कार, सभी कुछ तो है. बहुत सुंदर शुरुआत है.
- गुलशन मधुर, वाशिंगटन

ये वाकई बहुत अच्छी शुरुआत है. कम से कम मुझे अब ये पता चल पाया कि गुणानंद पथिक कौन थे. इसे लॉंच करने का शुक्रिया.
- दीपक डोभाल, वाशिंगटन

गिर्दा और विद्यासागर जी की आवाज़ सुनना ख़ास तौर से अच्छा लगा. मुझे विश्वास है हिलवाणी को पहाड़ की नई पुरानी पीढ़ियो का सक्रिय सहयोग और समर्थन मिलेगा.
- मंगलेश डबराल, दिल्ली

कंसेप्ट और कंटेंट बहुत अच्छा है. इन्हें बनाए रखें.
- रामदत्त त्रिपाठी, लखनऊ

वेबसाइट देखकर बहुत अच्छा लगा
- गोविंद सिंह, नई दिल्ली

वेबसाइट पसंद आई
- ललित मोहन जोशी, लंदन

अच्छी पहल, बधाई
- प्रोफ़ेसर गिरजेश पंत, देहरादून

बहुत बढ़िया शुरुआत. आला दर्जे की विविधता भरी सामग्री. बनाए रखें
- आनंद शर्मा, देहरादून

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