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जल जंगल
उत्तराखण्ड में आपदा कुप्रबन्ध की त्रासदी
Posted on: 2012-08-09

उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले में कुदरती कहर ने पुराने जख्मों को फिर से छेड़ दिया है. लेकिन सरकारें और प्रशासनिक सिस्टम कुछ सीखने और अपने को तैयार करने से परहेज़ ही करते आ रहे हैं. टिहरी उपचुनाव की राजनीति भी इस आपदा के भीतर घुस चुकी है और लोगों की तकलीफों पर और नमक छिड़क रही है. ये कैसी बेबसी और दुर्भाग्य उत्तराखंड के पहाड़ों के लोगों के लिए आ गया है.

क्या हम कुदरत के इन अचानक हमलों को पढ़ नहीं सकते या उनका कोई मोटा अनुमान नहीं लगा सकते. क्या 21वीं सदी में भी हमारा विज्ञान और हमारी समूची साइंस पोलिटिक्स अवाक है. इन्ही कुछ सवालों के जवाब की तलाश करता हुआ वरिष्ठ पत्रकार जयसिंह रावत का एक विशेष लेख हिलवाणी के लिए. आप भी अपनी राय इस पर दें. 

पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड पर सन् 2010 की अतिवृष्टि की तबाही के जख्म अभी भरे भी नहीं थे कि इस बार के मानसून ने भी आसमान से कहर बरपाना शुरू कर दिया। उत्तरकाशी की असीगंगा घाटी में बादल फटने के बाद हुयी भारी तबाही के बाद समूचा पहाड़ी राज्य कांप उठा है। दहशतजदा लोगों को भय है कि न जाने अब किस गांव और इलाके में आवारा बादल जलबम गिरा कर जल प्रलय मचा दें। उत्तराखण्ड में शायद ही कोई ऐसा वर्षाकाल गया हो जब मानसूनी आपदाओं में सौ से अधिक जानें न गयीं हों।

लेकिन हर बार आपदा न्यूनीकरण की तैयारियों की बात केन्द्रीय सहायता पर अटक जाती है और समस्या की जड़ जहां की तहां रह जाती है। देखा जाय तो सरकार का यह रुख भी जनता के लिये किसी त्रासदी से कम नहीं है। उमड़ते घुमड़ते घमण्डी बादलों की डरावनी गर्जनाओं के साथ मानसून जब घाटियों के रास्ते पहाड़ों पर चढ़ने लगता है तो आपदा प्रबन्धन की तैयारियों के लिये उत्तराखण्ड में भी सरकारी बैठकें शुरू हो जाती हैं।

लेकिन इन बैठकों का उद्ेश्य लोगों कोे खतरों से मुक्त कराना न हो कर आपदाग्रस्तों को राहत सामग्री बांटने और टूट फूट की मरम्मत के लिये केन्द्र सरकार से धन जुटाना होता है। जबकि ज्यादा उसका ध्यान लोगों की जानोमाल की हिफाजत पर होना चाहिये था। कुल मिला कर सरकार की सोच रेस्क्यू, सर्च और राहत राशि से आगे नहीं बढ़ पाती है। जबकि आपदा न्यूनीकरण के अन्य उपायों के साथ ही सबसे पहले लोगों के जानोमाल की हिफाजत के लिये पूर्व चेतावनी व्यवस्था की जानी चाहिये थी।

सरकार का यह आपदा कुप्रबन्ध नही है कि वह अपनी जिम्मेदारियों की शुरुआत आपदा हो जाने के बाद मानती है जबकि उसका ज्यादा ध्यान आपदा रोकने या नुकसान को अधिक से अधिक घटाने पर केन्द्रित होना चाहिये। हैरानी की बात तो यह है कि प्रदेश में आपदाओं से त्राहि-त्राहि मची हुयी है और प्रदेश के कई हुक्मरान ओलम्पिक के नाम पर लन्दन की सैर पर गये हुये हैं। यह सही है कि भूकम्प की भविष्यवाणी करना अब तक सम्भव नहीं हो सका है। लेकिन मानसून सम्बन्धी आपदाओं के बारे में सरकार आसानी से पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित कर हजारों लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचा सकती है। आज उपग्रहों की आंखे निन्तर धरती की हलचलें देखने के साथ ही उसका ऐक्सरे भी कर रही हैं।

मौसम विज्ञान इतना विकसित हो गया कि आसमान का मिजाज अब रहस्यमय नहीं रह गया। जहां भारी वर्षा होनी है वहां काफी पहले ही खतरे का ऐलान किया जा सकता है। पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट के प्रयासों से अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्र] रिमोट सेंसिंग] आइआइटी] भौतिक प्रयोगशाला] हैदराबाद जैसे भारत सरकार के 12 विशेषज्ञ संस्थानों ने मिल कर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड के लिये एक लैण्डस्लाइड जोनेशन मैप बना कर सन् 2002 में उत्तराखण्ड सरकार को सौंप दिया था। लेकिन राज्य सरकार उस नक्शे का आज तक सदुपयोग नहीं कर सकी। नक्शे के हिसाब से चार धाम यात्रा मार्ग और लगभग 7 सौ गांव भूस्खलन की जद में थे। राज्य सरकार के अपने आपदा प्रबन्ध केन्द्र ने भी भूस्खलन के लिये संवदनशील 232 गांव चिन्हित किये थे। इतनी जानकारियां होने पर भी राज्य सरकार पूर्व चेतावनी व्यवस्था विकसित करना तो रहा दूर वह हादसा हो जाने की जानकारी भी तत्काल नहीं जुटा पा रही है।

19 अक्टूबर 1991 को आये उत्तरकाशी के भूकम्प से लेकर अब तक का अनुभव यह है कि जब भी कोई आपदा होती है तो संचार व्यवस्था ठप्प हो जाती है।सन् 2009 में पिथौरागढ़ जिले के ला झेंकला आदि गावों में जब बादल फटा तो 12 घण्टों से भी अधिक समय तक देहरादून में बैठे मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव को हादसे की पूरी जानकारी नहीं थी। गत दिनों बादल फटने से असी गंगा और भागीरथी नदी में बाढ़ आई तो जिला मुख्यालय उत्तरकाशी समेत सारे प्रभावित क्षेत्र का संचारतंत्र ठप्प हो गया । यहां तक कि राज्य मुख्यालय देहरादून तक की मोबाइल और ब्राडबैण्ड सेवाऐं ठप्प हो गयीं थी। सरकार से सवाल पूछा जा सकता है कि आखिर आपने किस उद्ेश्य के लिये इन 232 गांवों का चिन्हाकन किया है। उत्तराखण्ड में भूस्खलन या बादल फटने और त्वरित बाढ़ की त्रासदियों का लम्बा इतिहास है।

पिछले डेढ सौ सालों के अन्दर इस पहाड़ी भूभाग में सेकड़ों की संख्या में विनाशकारी बरसाती त्रासदियां हो चुकी हैं। सन् 1868 में बिरही नदी के अवरुद्ध होने के बाद इस झील के टूटने से आई अलकनन्दा की बाढ़ में 73 लोग मारे गये थे उसके बाद इसी तरह गौणाताल का निर्माण हुआ और जब वह टूटा तो फिर अलकनन्दा में बाढ़ आ गयी। सन् 1970 में भी इसी तरह अलकनन्दा में बाढ़ आई। अग्रेजों द्वारा बसाई गई सरोवर नगरी नैनीताल पर भी इसी तरह 1880 में आपदा का कहर बरस चुका है। नैनीताल में उस समय आये भूस्खलन में 151 लोग मारे गये थे जिनमें अधिकांश यूरोपियन थे। सन् 1977 में इस तरह के हादसे में तवाघाट में 25 सैनिकों सहित 44 लोग मारे गये थे। उसके दो साल बाद 1979 में तत्कालीन चमोली जिले और आज के रुद्रप्रयाग जिले के कोन्था गांव पर आये भूस्खलन में 50 लोग मारे गये थे। इसी तरह 1996 में बेरीनाग में 18 लोग मारे गये।

सन् 1998 के अगस्त में ही मालपा में प्रख्यात नृत्यांगना प्रोतिमा बेदी सहित 60 मानसरोवर यात्रियों और स्थानीय गाइडों तथा पोर्टरों सहित लगभग 250 लोग मारे गये। उसके कुछ ही दिन पहले अगस्त माह में ही उखीमठ भूस्खलन त्रासदी में 103 लोग मारे गये थे। हड़की में सन् 2000 में 19, घनसाली और बूढ़ाकेदार में 10 अगस्त सन् 2002 में 28 लोग और 99 पशु मारे गये, बरहम में 2007 में 18 तथा हेमकुण्ड में 2008 में 11 लोग मारे गये थे। सन् 2009 में पिथौरागढ़ के ला झेंकला आदि गावों में बादल फटने के बाद आई बाढ़ में 43 लोग मारे गये। सन् 2010 का मानसून तो उत्तराखण्ड के लिये जल प्रलय ही लेकर आया। उस वर्ष वर्ष अतिवृष्टि, त्वरित बाढ़, बिजली गिरने और भूस्खलन से प्रदेश में 230 से अधिक लोगों की मौत हो गयी थी और 139 घायल हो गये थे।

उस साल अकेले 18 सितम्बर को अल्मोडा़ जिला समेत विभिन्न स्थानों पर 60 से अधिक लोग मारे गये थे। सबसे भयंकर विनाशलीला अल्मोड़ा जिले के देवली बाल्टा और पिलखा आदि गावों में हुयी। उससे पहले 18 अगस्त को बागेश्वर जिले के सुमगढ़ में स्कूल भवन पर मलवा आने से 18 बच्चे जिन्दा दफन हो गये थे। भूगर्वीय दृष्टि से उत्तराखण्ड तिब्बत के पठार से लेकर गंगा के मैदान तक हिमालयन फ्रण्टल थ्रस्ट, मेन बाउण्ड्री थ्रस्ट, मेन सेण्ट्रल थ्रस्ट (एमसीटी) और हिमाद्री थ्रट, मुख्य भ्रंशों के ऊपर अवस्थित है। इसमें से सबसे संवेदनशील मुख्य केन्द्रीय भ्रंश (एमसीटी) को माना जाता है जो कि काली नदी से लेकर कांगड़ा तक लगभग 2500 कि.मी. तक फैला है और सबसे अधिक भूगर्वीय हलचलें भी इसी के 10 से लेकर 20 किमी की चौड़ाई वाले क्षेत्रों में दर्ज होती रही हैं।

बड़े भूचालों और मालपा तथा केदार घाटी की भूस्खलन त्रासदियों के लिये भी यही भूगर्वीय दरार जिम्मेदार मानी जाती रही है। लेकिन इस पहाड़ी इलाके की मुसीबतों की जड़ यह अकेली दरार नहीं हैं। भूस्खलन, बादल फटने, आसमानी बिजली गिरने, त्वरित बाढ़ जैसी आपदाओं के लिये मौसम भी काफी हद तक जिम्मेदार रहता है। लेकिन आपदा न्यूनीकरण के कार्यक्रमों में मौसम विभाग कहीं नहीं है। दरअसल होता यह है कि नमी वाले बादल नदी घाटियों से होते हुये जब सहायक नदियों और उनके सहायक गधेरों की घाटियों में प्रवेश करते हैं तो आगे पहाड़ आ जाने से वे नम हवायें पहाड़ को लांघ नहीं पाती और एक साथ उसी स्थान पर बरस जाती हैं।

एक ही स्थान पर अचानक इतना अधिक पानी बरसने से नदी नालों में बहुत तेज बाढ़ आ जाती है जो कि आगे चल कर मुख्य नदी का प्रवाह तक रोक देती है। इन नदी नालों का ढाल 70 मीटर प्रति किलोमीटर से भी अधिक होता है जबकि भागीरथी का ढाल 42 मीटर, अलकनन्दा का 48 मीटर और भिलंगना का 52 और अलकनन्दा की सहायिका धौलीगंगा का ढाल 75 मीटर प्रति कि.मी है।पहाड़ी नाले इससे भी अधिक ढलान पर बहते हैं कि जिससे उनका जलप्रवाह गोली की माफिक चलता है और इधर- उधर की पहाडियों पर टकराने से मिट्टी, पत्थर, बोल्डर और बड़े पेड़ चलने से नदी या नाले भयंकर रूप ले लेते हैं। चाहे असीगंगा और भागीरथी की ताजा बाढ़ हो या फिर 1970 या उससे पहले की अलकनन्दा की बाढ़ हो, उन सब बाढ़ों का कारण ऐसी ही छोटी नदियां रही हैं।

इस तरह के नालों में बाढ़ से कई बार अलकनन्दा, यमुना और भागीरथी नदियां अवरुद्ध हो कर भयंकर बाढ़ों को जन्म दे चुकी हैं। इस समस्या का अध्ययन करने के लिये न केवल मौसम विभाग बल्कि जलतंत्र के विशेषज्ञ विभागों और वन विभाग को भी शामिल किया जाना चाहिये था। एक बार कुमायूं विश्वविद्यालय में ऐसे ही भूस्खलन पूर्व चेतावनी केन्द्र खोले जाने की खबर आई थी।

उसके बाद उत्तराखण्ड सरकार ने भी भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण (जीएसआई) विभाग के सहयोग से ऐसा केन्द्र खोलने की घोषणा की थी। उस योजना के तहत रॉक ड्रिलिंग, चट्टानों की बनावट, चट्टानों का स्वभाव और रॉक मैकेनिक आदि के अध्ययन से भूस्खलन की समस्या वाले स्थानों का पता लगाया जाना था। जीएसआई की भूस्खलन शाखा फिलहाल लखनऊ में है जिसकी एक शाखा को देहरादून में खुलना था। लेकिन यह घोषणा भी कोरी ही साबित हुयी।

-जयसिंह रावत

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Comments

naveen kumar naithani2012-08-10 09:25 PM
बहुत सामयिक एवं जानकारीपूर्ण लेख!अभी तक सामान्य लोग बादल फटने का सही अर्थ नहीं जान पाये हैं. जानकारियां तब तक बेअसर हैं जब तक कि योजनाकारों के पास क्रियान्वयन की इच्छा-शक्&

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