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देस परदेस
भाषाओं में निवास करती हैं परंपराएं
Posted on: 2012-06-20

युवा लेखक और शोधकर्मी सुरेंद्र सिंह रावत ने भाषाओं की समृद्धि से जुड़ी चिंताओं पर ये लेख हिलवाणी को भेजा है. ज़ाहिर है इस चिंता के केंद्र में उत्तराखंड की भाषा-बोलियां भी हैं.


उत्तराखंड की भाषाओं का खिसकता जनाधार और सामाजिक-सांस्कृतिक ह्रास


शब्द सबसे बड़े यायावर हैं और मानव मन की अभिव्यक्ति के साधन भी। जो बोली-भाषा के रूप में समाज में स्थापित होते हैं। मनुष्य जिसे कभी रोजी-रोटी की तलाश में तो कभी अन्य कारणों से स्थान परिवर्तन करना पड़ता है, अपने साथ अपनी बोलचाल की भाषा को साथ लेकर चलता है और भाषा अपना प्रचार-प्रसार पाती है। हमारे समाज ने भी रोजी-रोटी के चलते देवभूमि उत्तराखंड से शहरों की ओर रुख किया जोकि काफी हद तक उनकी मजबूरी भी थी। और नियमानुसार उनके साथ उनकी बोली-भाषा ने भी उनके साथ सफर किया लेकिन अफसोस होता है बोली-भाषा का ये सफर गति न पा सका, अवरुद्ध हो गया।

उत्तराखंड जहां मुख्यत दो भाषाएं बोली जाती हैं गढ़वाली और कुमाऊनी तथा तीसरे नंबर पर आती है जौनसारी, लेकिन जब समाज की तरफ नजऱ दौड़ती है तो मन में एक मायूसी सी घर कर जाती है कि समय के साथ कदमताल करती युवा पीढ़ी का अपनी भाषाओं से कोई सरोकार नजऱ नहीं आता। साफ तौर पर इसके दो कारण नजऱ आते हैं जो उत्तराखंड की भाषाओं के अवरुद्ध होने के लिए जिम्मेदार हैं—पहला वह पीढ़ी जिसने रोजी-रोटी की तलाश में पलायन किया था उसने अपने घर-बार में आपस में (पति-पत्नी ने) तो इन भाषाओं में बात की लेकिन अपनी भावी पीढ़ी (बच्चों) को एक थाती के रूप में इसके महत्व को नहीं समझाया और न ही उन्हें ये भाषा सिखाने के लिए कोई प्रयास किया जिसके चलते युवजनों ने भी इसे अपनाने का कोई प्रयास नहीं किया।

दूसरा उत्तराखंड के स्तर पर बेरोजगारी की समस्या जिससे सीधे तौर पर जुड़ा है पलायन और उसी के साथ भाषा का ह्रास होना। और इस तरह गढ़वाली-कुमाऊनी धीरे-धीरे घर के भीतरी कोनों में कब खिसकती चली गयी पता ही नहीं चला और कब हमारा नाता अपनी ही भाषा से दूर की रिश्तेदार में तब्दील हो गया और दिन-ब-दिन और दूर होता जा रहा है इसका हमें भान भी नहीं हो पाया और न वर्तमान में हो रहा है। भाषा से यूं विमुख हो जाना कई मायनों में गंभीर अर्थ रखता है, क्योंकि जब भाषा का विकासक्रम अवरुद्ध होता है तो साथ ही साथ बकौल नोबेल पुरस्कार विजेता चीनी लेखक गाओ जि़ंग्जियान के अनुसार—ये भाषा ही है जिसमें क्षेत्र की परंपरा निवास करती है।

संस्कृति और भाषा सदा से निकट का संबंध रखती आई हैं। भाषा यदि अवनति की ओर जाएगी तो सीधे तौर पर हमारी परंपराएं और हमारी संस्कृति भी उसके साथ अवनति की ओर अग्रसर होंगी। भाषा ही है जो आदमी को आदमी से जोड़ती है। लिखित शब्द इस अर्थ में भी जादुई हैं, क्योंकि वे दो भिन्न लोगों के बीच संवाद कायम करते हैं चाहे वे भिन्न काल के ही क्यों न हों। इसका एक और गंभीर परिणाम जो मुझे अपने तईं नज़र आता है वो है साहित्यकार की मौत। क्योंकि एक लेखक पूरी तरह भाषा पर निर्भर करता है और जिस भाषा का जनाधार ही धीरे-धीरे खिसकता जा रहा हो और ऊपर से तुर्रा ये कि राज्य में भी भाषा का कोई खैरख्वाह न हो तो फिर एक लंबी चुप्पी लेखक के मन पर तारी हो जाती है और लेखक का यूं चुप हो जाना ही उसकी मौत के समान होता है।

साथ ही साहित्यकारों के अभाव में समाज भी गति नहीं पा पाता क्योंकि जब उसे कोई आईना दिखाने वाला ही नहीं रहता तो फिर समाज से विचारणा शक्ति भी जाती रहती है। आज वो समय है जब हमारे समाज को भाषा के महत्व को जानना ही होगा। खासकर ऐसे दौर में जब हम अपनी जड़ों से कटकर, विमुख होते जा रहे हैं साझी विरासत के उन मूल्यों से जिनके बिना पहले समाज का ह्रास होना शुरू होता है और फिर धीरे-धीरे समाज को जोडऩे वाली साझा संस्कृति विलुप्ति की कगार पर आ जाती है। इसी के साथ इंसान को इंसान से काटने वाली उपभोगतावादी संस्कृति समाज पर हावी हो जाती है। ऐसे में साझी विरासत के इस रूप (भाषा) का संरक्षण व संवर्धन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

आखिर भाषा में ये साझापन क्या है, तो मुझे सुषमा नैथानी जो अमेरिका में वैज्ञानिक हैं व कवियत्री भी, के शब्द बरबस ही याद हो आते हैं कि—इतना याद रहा कि इस भाषा को सुनते हुए लगता कि़ लोग गाकर बात करते है। स्वर और शब्द साथ-साथ रोतें है, हँसतें है, गढ़वाली में बात करना ऐसे, जैसे कोई लगातार गाने का रियाज़ हो, उसकी लय में ही उदासी, उल्लास, बैचैनी सारे भाव इतनी आसानी से घुले रहते की शब्दों को भी पकडऩे की ज़रुरत नहीं पड़ती। ऐसा ही कुछ कुमांयुनी, और डोगरी सुनते हुए भी लगा, शब्द और भावों की भिडंत न होती, आर-पार सब पारदर्शी ...। आर-पार की ये पारदर्शिता यूं ही बरकरार रहे इसके लिए हमें अपने अंदर भी झांकना होगा। क्योंकि जाने-अनजाने हमारे मन में जो सबके बीच घुल मिल जाने की चाह है, जोकि भीड़ के बीच अलग इंगित होने के डर के परिणाम-स्वरूप है उसे दरकिनार करना होगा। ताकि मानव मन की अभिव्यक्ति के साधन शब्दों की यायावरी अनवरत जारी रहे।

वाल्मीकि रामायण के एक श्लोक का अंश है—जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी अर्थात् माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढक़र होती है। यहां मातृभाषा जो है, माँ के समान है और वह मातृभूमि से जुड़ी हुई है। माँ, मातृभूमि और मातृभाषा की यह त्रिमूर्ति सदा वंदनीय हैं। इस त्रिमूर्ति को विस्मृत करना अक्षम्य अपराध है। ऐसा अक्षम्य अपराध जिसमें हम अपनी बहुमूल्य परंपरा, अमूल्य विरासत को भावी पीढ़ी तक पहुंचने से रोकते हैं। समय अभी चूका नहीं है।

आइए हम अपने कर्तव्य के प्रति सजग हों और वैश्वीकरण के बढ़ते दौर में अपनी इस साझी विरासत को अगली पीढिय़ों तक पहुंचाने का संकल्प लें। इसके लिए हमें योजनाबद्ध रूप से काम करना होगा। समाज में ऐसे अनुभवी व्यक्तियों के अनुभवों को आगे लाना होगा जो भाषा के प्रति गंभीर सोच रखते हैं और इस दिशा में निरंतर प्रयासरत हैं। इनके माध्यम से ऐसे पाठ्यक्रमों का निर्माण करना होगा जो भाषायी आयाम के साथ-साथ सामाजिक व सांस्कृतिक आयाम की भी पूर्ति करता हो। ताकि हम वह दिन देखने के लिए मजबूर न हों जब अपनी अमूल्य निधियों को जो पुस्तकालयों तथा अभिलेखागारों में पांडुलिपियों के रूप में सुरक्षित हैं उनको बांचने व समझने के लिए अपनी ही भाषा (गढ़वाली-कुमाऊनी) के विशेषज्ञों को विदेशों से बुलाना पड़े। आइए इसी सोच के साथ भविष्य के मद्देनज़र इस दिशा में कदम बढ़ाएं, पगड़डियों का निर्माण करें राहें अपने-आप बनती चलेंगी।

और अंत में...

मुझे देश की आज़ादी और भाषा की आज़ादी में से किसी एक को चुनना पड़े तो मैं नि:संकोच भाषा की आज़ादी को पहले चुनूंगा, क्योंकि मैं फायदे में रहूंगा। देश की आज़ादी के बावजूद भाषा की गुलामी रह सकती है, लेकिन अगर भाषा आज़ाद हुई तो देश गुलाम नहीं रह सकता। —गणेश शंकर विद्यार्थी

-सुरेंद्र सिंह रावत, डी-234, गली नं. 10 लक्ष्मी नगर, दिल्ली-92. मोबाइल - 09711168315 (इंस्टीट्यूटट फॉर सोशल डेमोक्रेसी, दिल्ली में बतौर ट्रेनर के तौर पर कार्यरत.)

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Comments

जयेंद्र 2012-06-20 12:35 AM
बहुत बढ़िया लिखियु च, सुरेन्द्र रावत जी आपन,
भाषा एक बहुत महत्वपूरण मुद्दा हैं,
भाषा का नजरंदाज़ भी किया जा रहा हैं,
जिसका पहला मुख्य कारण जैसा आपने कहा पलायन हैं, और दूसर&#
डॉ. बिहार2012-06-21 02:10 AM
वर्तमान समय में जिस तरह से उत्तराखंड की भाषाओं का ह्रास हो रहा है वाकई गंभीर मुद्दा है। और भाषा के ह्रास के साथ-साथ जो अन्य चीजें जुड़ी होती है वो भी किस तरह धीरे-धीरे मरती है
Tara Datt Joshi2012-06-27 02:30 AM
lekhak ka mat bahut achha hai, kintu suchar apne se hee suru karna hoga. jab ham apne bachho ko apnee bhasha ke bare mai jankari dange tabhee anya log bhee es ka anusaran karange. ajkal jankar log samaj ko to achhi nasihat dete hai lakin us per khud amal nhee karte hai.
Biharilal2012-06-28 11:21 PM
BIHARILAL
जोशी जी बात तो आपने सही कही कि जानकार लोग अमल नहीं करते। लेकिन सभी को एक तराजू में नहीं तोला जा सकता। दूसरे किसी चीज को पढ़कर कमेंट पास कर देना और उसे ग्रहण कर अमल करना भी दो
Biharilal2012-06-28 11:23 PM
दूसरे किसी चीज को पढ़कर क्मेंट पास कर देना और उसे ग्रहण कर अमल करना भी दो अलग-अलग बातें हैं।

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