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तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है पार्टनरः गुंटर ग्रास के सवाल

“जो कहना ही होगा” कहकर गुंटर ग्रास ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हल्कों में खलबली मचा दी है. ग्रास पहले लेखक हैं जिन्होंने पूरी सामर्थ्य या कहिए पूरी स्पष्ट गूंज के साथ इस्राएल पर निशाना साधा है. इस्राएल आगबबूला है. उसे जैसे किसी ने उसकी वो अमेरिका परस्त युद्धपरस्त फ़िलस्तीन से घृणा भरी ताक़त और उन्माद से भरी हुई बेरौनक सी तस्वीर दिखा दी है.
गुंटर ग्रास की इस्राएल के रवैये पर लिखी कविता पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
इस्राएल को पहली बार कड़े शब्दों में बताया गया है कि वो क्यों पहले से ही नाज़ुक चली आ रही विश्व शांति के लिए एक गंभीर ख़तरा बन गया है. शांति शांति गाने वाली पूर्वाग्रही विश्व सरकारें जब ये नहीं कर पाईं तो 84 साल के बीमार थके हारे ग्रास को जर्मनी के हाम्बुर्ग शहर में अपने घर से एक अख़बार में एक कविता भेजकर इस्राएल को फटकार लगाने का ये दुस्साहस करना पड़ा. यूरोप में और अमेरिका में और एशिया में ग्रास की कविता को लेकर भारी बहस छिड़ गई है, ग्रास के ख़िलाफ़ एक उन्माद सा बन गया है. जिसे लेकर ग्रास ख़ुद हैरान हैं.
उन्होंने इस्राएल की बंदिशों की तुलना पूर्वी जर्मनी की कुख्यात ख़ुफ़िय़ा पुलिस श्तासी से की है. उनका कहना है कि उन पर बंदिश श्तासी ने लगाई थी. फिर म्यांमार में लगी और अब इस्राएल तीसरा देश हो गया. ग्रास की कविता को लेकर ये बहस संयोगवश ऐसे वक़्त में उठी है जब यूरोप के ही एक देश नॉर्वे की एक अदालत में एक जुनूनी नवनात्सी के ख़िलाफ़ नरसंहार का मुक़दमा चल रहा है. ग्रास की कविता इस्राएली सरकार को संबोधित है, उन्होंने पिछले दिनों कहा कि वो इस्राएल न लिखकर सरकार लिखते तो शायद इतनी आलोचना न झेलनी पड़ती लेकिन ज़ाहिर है उनका इरादा इस्राएली सरकार की एटमी युद्ध की पिपासा और ईरान को मिटा देने की सनक को दुनिया के सामने लाने का ही था. और इस बहाने वो जर्मनी और पश्चिमी यूरोप में उठ रहे नवनात्सीवाद के नए ख़तरों से भी नागरिकों को बाख़बर करना चाहते थे.
ये कहने का औचित्य नहीं है कि ग्रास 17 साल की उम्र में हिटलर की कुख्यात एसएस हमलावर टुकड़ी का हिस्सा थे और ये कविता उनके उस नात्सी अतीत की चाहत है. उसका “पुनरावलोकन” है. ये दलील बेकार है. सब जानते हैं कि दुनिया को ये बात उन्होंने ही बताई थी. ग्रास असल में अपनी इस कविता के ज़रिए कई राजनैतिक कूटनीतिक शेड्स पर काम कर रहे हैं. उन्होंने ये दिखाया है कि जर्मनी जैसे देश को और उसके नागरिकों को अपने उस ऐतिहासिक अपराधबोध से अब बाहर आना चाहिए जो यहूदी नरसंहार से जुड़ा है. दूसरा वो यहूदी मोहवाद से भी छुटकारा पाने का संदेश इस कविता के ज़रिए देना चाहते हैं जिसकी वजह से पश्चिम एशिया(मिडल ईस्ट) में एक देश की सत्ता व्यवस्था न जाने क्यों अपने गठन के समय से ही जुनूनी दंभी हिंसक और युद्ध पर आमादा बनी हुई है.
असल में हाल के अंतरराष्ट्रीय राजनीति के परिदृश्य को देखें और इसमें भी पश्चिम एशिया को लें तो वहां इस्राएल की फ़िलस्तीनी आकांक्षाओं का दमन करने की नीति यूरोप के कई देशों के नागरिकों को रास नहीं आ रही है. ख़ासकर जर्मनी में एक तबका तेज़ी से उस अपराधबोध को न ढोते रहने की नैतिक व्यवहारिकता में आ रहा है जो यूं अब एक और बड़े अपराधबोध का कारण बन सकता है. अब इस्राएल के इरादों को लेकर जर्मन समाज में बहुत धीमी और बहुत कम स्तर पर ही सही एक बहस छिड़ चुकी है. यूरोप में कई जनसंगठन इस पर बहस करने को उन्मुख दिखते हैं. आने वाले वक़्तों में वे अपनी सरकारों से भी सवाल करने की स्थिति में आते दिख रहे हैं. ग्रास की कविता उन्हें निर्णायक धक्के( पुश) की ओर ले जाती है. इस लिहाज़ से वो एक पोलिटिक्ल चतुराई है.
वो उस बहुत मद्धम सी दिखती हलचल को शायद पकड़ चुके हैं और उसे मुखर करना चाहते हैं. क्या होगा जो ग़ज़ा और पश्चिमी तट तबाह हो जाएं, क्या होगा जो अगर जर्मनी की दी हुई एटमी हथियारों से लैस पनडुब्बियां ईरानी लोगों पर कहर बरपा दें. क्या होगा जो इस तरह के किसी न किसी एक बहाने से तीसरा विश्व युद्ध छिड़ जाए. क्या होगा जो यूरोप एक बार फिर ख़ून से सन जाए. क्या होगा अगर ख़ामोशी बहुत देर तक बनी रहे और फिर देर हो जाए. ग्रास की कविता हमें बहुत दूर की उन आशंकाओं का डर नहीं दिखाती, वो हमारे बहुत पास के भय को चिन्हित करती है.
युद्ध की आशंका में घुलते रहने का डर, नफ़रत और हिंसा के और फैलते जाने का डर, विश्व भाईचारे के ख़ात्मे का डर, अन्याय और बर्बरता और आर्थिक विषमता के जाल में और उलझते जाने का डर. ग्रास ने कविता का फ़ॉर्म इसीलिए लिया क्योंकि उन्हें लगता होगा कि शायद उसकी सामर्थ्य दूरगामी प्रभाव वाली होगी, वो बहुत लंबे समय तक भुलाई न जा सकेगी. और उसकी फटकार से इस्राएल बिंधता हुआ रहेगा, 71 लाइनों की बुनावट उसे संभवतः किसी न किसी नैतिक दबाव के घेरे में लिए रहेगी भले ही वो प्रकट तौर पर कितना ही हठी क्यों न नज़र आए. कविता के गुण दोष के लिहाज़ से ग्रास भी मानते हैं कि ये कोई महान कविता नहीं है, इसकी साहित्यिक कमियों पर बहस की गुंजायश इसीलिए है ही नहीं, ये एक सीधा गहरा स्पष्ट दुस्साहसी बयान है.
और ग्रास ने इसे एक कुशल कारीगर की तरह कविता में ढाला है. उन्हें कविता में शिल्प से ज़्यादा संदेश की फ़िक्र थी. अब रही बात कि आख़िर ग्रास इस्राएल को ही क्यों निशाने पर ले रहे हैं. ईरान की हठधर्मिता, धार्मिक मतांधता, कट्टरता और मानवाधिकार हनन और अन्य बर्बरताएं क्या उन्हें नहीं दिखीं. इस मामले के कुछ बिंदुओं पर ऊपर यूं बात हो चुकी है. अगर बारीक़ी से देखें तो इस कविता में ग्रास ने ईरानी जनता से भी अपनी सरकार से सावधान रहने और उससे जवाब मांगने का आह्वान किया है. उठ खड़े होने की ज़रूरत उन्होंने वहां भी बताई है. दूसरी बात ईरानी हुकूमत के दमन रवैये पर कुछ न लिखने का अर्थ ये नहीं है कि इस्राएल की युद्ध पिपासा पर और एटमी भूख पर चुप्पी लगा ली जाए.
ईरान की राजनीति को नज़दीक से देखने वाले जानते हैं कि वहां किस तरह एक आलोड़न समाज और राजनीति में फैल रहा है. आवाज़ें उठने लगी हैं. अहमदीनेजाद और ख़मैनेई यानी सरकार और सर्वोच्च सत्ता के बीच सैद्धांतिक और व्यवहारिक टकराव तेज़ हो गए हैं. एक बड़ा आंदोलन वहां 2009 में हो चुका है. और ईरान से निकलकर कुछ वहां रहकर जेनुइन रचनाकार जनता के हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं. ऐसे भी बेशक कई अमेरिकापरस्त ईरानी बुद्धिजीवी पूरी दुनिया में डोल रहे हैं जो एक निर्दिष्ट एजेंडे के साथ ईरान में हालात को पश्चिमी सामरिकता के आईने में दिखा रहे हैं लेकिन असली लड़ाई वहां जारी है. ये सच है.
अब सवाल ये है कि ईरान पर इतना तूफ़ान खड़ा करने वाले देश इस्राएल में क्या ऐसा कोई आंदोलन या आवाज़ प्रखरता से उठ रही है. क्या उसका समाज उस यथार्थ के साथ खड़ा होने के लिए तत्पर नज़र आता है जिसमें फ़िलस्तीन के लिए भी देश के रूप में जगह होगी. इस्राएल नात्सीवाद से घृणा करता हुआ आख़िर इस्लाम के ख़िलाफ़ क्यों होता चला गया. ग़ज़ा पर क्यों वो हमलावर है, उसका ख़ौफ़ क्या है. उसे ईरान से पड़ोसी अरब देशों से डर क्यों लगता है. उसे हर कहीं यहां तक कि भारत में भी डर क्यों लगता है.
ये सारे सवाल और इस तरह के बहुत सारे कुछ ऐसे पेचीदा हैं और इतने सारे हैं कि राजनीति और सत्ता सिस्टम और अमेरिकावादी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति इनसे बचकर निकलना ही बेहतर समझती है. तो ऐसे में कौन सामने आता है. ऐसे में क्या करना होता है. ऐसे भयावह माहौल में क्या कहना होता है. वही जो गुंटर ग्रास ने कहा वही जो मुक्तिबोध रघुबीर सहाय अरुंधति रॉय यहां हिंदुस्तान में कहते आए हैं, वही जो चोमस्की और माइकल मूर अमेरिका में कहते हैं. उन जैसे लोग कहते लिखते आ रहे हैं.
और ये सिलसिला भले ही धीमा है जब तक साहस है तब तक चलता ही रहेगा. और प्रकाशित प्रसारित ये किसी भी भाषा में हो मुख़ातिब पूरी दुनिया के नागरिकों से होता रहेगा.
-शिवप्रसाद जोशी
गुंटर ग्रास की कविता पढ़ने के लिए इस लाइन पर क्लिक करें, अनुवाद वरिष्ठ हिंदी कवि मंगलेश डबराल ने किया है.
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