• उत्तराखंड में मॉनसून का कहर, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिलों में भारी नुकसान 
  • केदारनाथ घाटी तबाह, पचास के मरने की आशंका 
  • चार धाम यात्रा रुकी, जगह जगह 50 हज़ार से ज्यादा यात्री फंसे 
  • देहरादून में टूटे बारिश के 80 साल पुराने रिकॉर्ड 
  • आईटीबीपी और सेना के जवान राहत बचाव कार्य में जुटे 
  • केदारनाथ का मंदिर परिसर भी बर्बाद 
  • केंद्र ने सेना को लगाया, वायुसेना के हेलीकॉप्टर 
  • गढ़वाल के कई गांवों का संपर्क कटा, लोग मुश्किल में 
रंग मंडप
कला में दिक् काल और उसके साजो सामान

युवा चित्रकार सुरेंद्र जोशी के रचनाकर्म पर शिवप्रसाद जोशी
 
स्मृतियों के बेढ़बपन, उनकी गैरतरतीबी, उनका अटपटापन, उनकी दरारें क्या व्यवस्थित की जा सकती हैं. क्या वे वैसा का वैसा रखी जा सकती हैं जैसा हमारे अनुभव में आती हैं. जैसे वे हमारे सपनों में आती हैं. क्या उनकी कोई ‘विखंडित व्यवस्था’ बनती है. कुछ इसी तरह के सवालों के जोखिम के साथ नये प्रयोग कर रहे हैं युवा चित्रकार सुरेंद्र जोशी.
 
उन्होंने कैनवस मिक्स मीडिया एक्रिलिक उपकरण औजार पेंट क़ाग़ज़ टेक्सचर के साथ जो तोड़फोड़ की है वो अभूतपूर्व है. अपने समकालीनों में इसीलिए सुरेंद्र जोशी का काम अलग से पहचाना जा सकता है. भारत की समकालीन कला में सुरेंद्र के काम को इसीलिए तवज्जो भी मिलती रही है. स्मृति का टेक्सचर रच देना ज़ाहिर है रचनात्मक दुस्साहस की मांग करता है. एक अलग क़िस्म की कल्पनाशीलता तो इसके लिए चाहिए ही. सुरेंद्र जोशी बहुत ही निजी क़िस्म का काम रचते हैं. उनमें एक बहुत ज़्यादा इंडीविजुएल आर्टिस्टिक जुनून है.

वे समकालीन यथार्थ के प्रकट बिंबों से अलग उसी समकालीनता के ऐसे बिंबों की तलाश करते हैं जो बेध्यानी में रहने को अभिशप्त हैं. कह सकते हैं कि सुरेंद्र अपनी कला से ऐसे बिंब बजाय तलाश करने के उन्हें निर्मित करते हैं. कनाडा की मशहूर आर्टिस्ट मार्ग्रेट रोज़मैन ने कहा था कि वो एक रिएलिस्टिक सबजेक्ट के एक अमूर्त तत्व की तलाश में रहती है और उसमें दिलचस्पी जगाने और गहराई निर्मित करने के लिए टेक्सचर का इस्तेमाल करती हैं. सुरेंद्र जोशी कमोबेश ऐसे ही एक बिंब के साथ एक बिंब अपना ले आते हैं. स्मृति के साथ लकीर आती है. लकीर के साथ धागा. धागे के साथ दरार. दरार के साथ रंग, रंग के साथ कैनवस का टुकड़ा. और उस टुकड़े के साथ एक पूरा विज़ुअल विधान.
 
ये सुरेंद्र जोशी का निर्मित शिल्प है. उनके यहां पेंटिंग एक सजीधजी सुव्यवस्थित रंगदारी में पेश की हुई दिखती है लेकिन आप ज़रा ग़ौर से देखें तो पाएंगें कि उसमें हर उस चीज़ का अपना उत्ताप अपनी उद्विग्नता अपना कोहराम है जिनका ज़िक्र उपरोक्त लाइनों में है. वहां जो पेश किया जा रहा है वो पेशानी पर भी लकीरें खींच देता है. तो ये तोड़फोड़ ज़रा अलग क़िस्म की है अलग ढर्रे की है. ये तोड़फोड़ एक कैनवस को धागों से लकीरों से आयातों वर्गो और तिकोनों से भर देती है एक संतुलन को अस्थिर कर देती है और एक नए असंतुलन की रचना करती है. ये असंतुलन भी इतना सधा हुआ है कि कोई रंग फिसलता नहीं है कोई सिमिट्री टूटती नहीं है कोई विचार गिर नहीं जाता है.
 
सुरेंद्र जोशी पेंटिग में स्मृति के इसी व्यवस्थित तार्किक टेढ़ेपन के पेंटर है. वे उलटपुलट के पेंटर हैं. उनके यहां स्मृति की रेखाएं कहीं से भी निकलकर कहीं चली जाती हैं. कभी वे एक ख़ामोश आकृति की तरह बीचोंबीच झूलती रहती हैं जैसे किसी अभिशप्त समय की कोई धारा. जैसे हमारे ही समय की एक ज़ख़्मी पुकार. जो लकड़ी के नुकीले लंबे टुकड़े की तरह है या फिर बर्फ़ की नुकीली फटी हुई सिल्ली की तरह या रोशनी की एक दूर तक खुलती हुई जाती फांक और उत्तरोत्तर और तीखी होती हुई. उसके आसपास अन्य बैचेनियां हैं. सुरेंद्र जोशी ने क़ाग़ज़ पर मिक्समीडिया से भी स्मृति रेखाएं निकाली हैं. वो एक यात्रा सरीखी है. अतीत से एक झुटपुटा निकलता है और आज में डूब जाता है वहां से उठकर मुस्तकबिल का कोई नज़ारा बन जाता है.

ये एक वर्गाकार ज़मीन है और टेक्सचर की खिलंदड़ी यहां भरी हुई है. टेक्सचर को साधने की सुरेंद्र की ख़ासी कोशिश रही है और इस दिशा में वो क़ामयाब भी होते दिखते हैं. सुरेंद्र जोशी की कला बुनावट का अहम हिस्सा है उसके सूक्ष्म ब्यौरे. उनकी पेंटिंग का दिक् काल तीन और चार आयामी न होकर बहुआयामी है. उनकी ख़ूबी ये है कि उन्होंने स्मृतियों को ज्ञात अज्ञात विमाओं में उकेर दिया है. वहां उनके निराले प्रकोष्ठ हैं. पॉकेट्स में अपनी बात कहने वाले सुरेंद्र शायद अकेले समकालीन चित्रकार होंगे. और ये पॉकेट्स कलर वैल्यु के अनूठे नज़ारे पेश करते हैं. इस सबके बीच सुरेंद्र जोशी पार्टिकल्स और सब पार्टिकल्स के पेंटर हैं.

उनके यहां टुकड़ों की अस्पष्टता की दुर्बोधता की भरमार है. और ये सायास नहीं है. ये उनका पेंटर व्यक्तित्व है. जहां बहुत ज़्यादा कलात्मक कारीगरी नहीं है, कोई लपकता हुआ आता सबजेक्ट नहीं है. लेकिन कंट्रोल पूरा है. ये नियंत्रण आप उनके रंग प्रयोग उनके टेक्सचर उनकी ज़मीन के बिखराव में देख सकते हैं. ब्रह्मांड में जो सूक्ष्म हलचलें हैं, उन्हें लेकर भौतिकी के जो तानेबाने सुलझाए जा रहे हैं बनाए जा रहे हैं एक बड़ी विकट क़िस्म की उलझन में जो डार्क एनर्जी को समझने की तलाश जारी है उसके रूप भौतिकी से इतर कलाओं में भी नुमायां होते रहते हैं. संगीत में वो है. कविता में वो है. वो पेटिंग में भी है. जाने अनजाने सुरेंद्र जोशी की पेंटिंग भी उन विकटताओं के निकट जाने का साहस करती है. यही उसकी ख़ूबी है.

ब्रह्मांड में नया क्या हो रहा है कभी कभी ये जानने के लिए गणित की समीकरणें काफ़ी नहीं पड़तीं, तब कला की लकीरें बिंदु रंग कोण टेक्सचर शेड ये काम करने लगते हैं. ज़्यादातर समय वे अबूझ ही रह जाती हैं. सुरेंद्र जोशी इसी अबूझ सिस्टम के नवकलावैज्ञानिक सरीखे हैं. उनकी नई पेंटिंग्स अंततः साइंटिफ़िक टेंपर की निराली झलकियां हैं. उनमें आप लगातार कुछ देखते रहकर कुछ खोजते रह सकते हैं. कमसेकम ये बात कमोबेश हर अच्छी आर्ट पर लागू होती है.
 
सुरेंद्र जोशी की आर्ट देखते हुए उसमें खोजते रहने के अलावा जो ख़ास आपके साथ होता है वो ये है कि वहां आप जोड़ते भी जाते हैं. वे आपकी अपनी स्मृतियों का निरूपण हैं. वे लकीरें वे धागे वे शेड वे ग्राफ़िक वे तनाव वे निस्पृह उद्दाम उदासी के कलर टोन्स जिस समय आप देख रहे होते हैं ठीक उसी समय आपके पास से छिटककर वहां टंग गए हैं. आप अपनी स्मृति रेखाओं की ऋंखला के सामने हैं.
 
-शिवप्रसाद जोशी

Photogallery


Hillwani Gallery Hillwani Gallery Hillwani Gallery

More...


Click to print the article.

Comments


Post Your Comments




Follow us on:


हिलवाणी से जुड़ें

हिलवाणी, उत्तराखंड और पहाड़ों को देखने, जानने और समझने का सीधा और सरल ज़रिया. हिलवाणी आपकी वेबसाइट है. हिलवाणी से आप भी जुड़ें. अगर आपके पास है कोई दिलचस्प समाचार,विचार या फ़ोटो तो हमें भेजें. ईमेल करें shiv@hillwani.com या shalinidun@gmail.com पर.

Join Us

Hillwani is an easy way to know and reach Uttarakhand and the Hills.
Hillwani is your website
Join Hillwani
If you have any news,views or photos you find interesting.
Do send us at-
shiv@hillwani.com
joshishiv9@gmail.com

हिलवाणी के लिए

आप लोग इस साईट को लगातार सुधार रहे हैं, यह एक सुखद संकेत है. इस साईट पर आकर एक सुखद अहसास होता है. साईट को और लोकप्रिय बनाने के लिए कुछ और तेजी और आक्रामकता लाइए.
- गोविंद सिंह, हल्द्वानी

HILLWANI IS BRAND E MAGAZINE OF HILLS NOW. IT IS SURPRISING THAT U R RUNNING IT SINCE A LONG TIME WITHOUT ADVERTISEMENTS. WELL DONE.
- mukesh nautiyal, dehradun

शालिनीजी, हिलवाणी वेबसाइट बहुत अच्छी लगी. काफी मेहनत से आप लोग अपडेट रखते हैं. आप और आपके साथियों को बधाई.
- हारिस शेख, मुंबई

Hillwani seems to be a great effort towards establishing a local cybersite for the uttarakhandis. Keep it up and please keep it updating.
- पीसी जोशी, नई दिल्ली

gone through the hillwani site. Enjoyed watching photos and reading reports. Doing great job.
- हर्षवंती बिष्ट, उत्तरकाशी

एक पहाड़ी इ-पत्रिका के रूप में हिलवाणी का आना अच्छा लगा
- हेमचंद्र बहुगुणा, दिल्ली

हिलवाणी पहाड़ के सरोकारों, उम्मीदों और लक्ष्यों को सार्थक तरीके से सामने लाने की एक पेशेवर कोशिश बनी रहे, ऐसी कामना है
- रामदत्त त्रिपाठी, लखनऊ

i visted hillwani recently and find it very interesting and full of knowledge not only about news and views on my Motherland Uttarakhand but also about the major issues and problems of this Himalayan state.
- गीतेश नेगी, सिंगापुर

hillwani as VIBGYOR on mountains
- भास्कर उप्रेती, देहरादून

हिलवाणी के लिये बधाई.पहाड़ के लोगों को अपनी धरती से प्यार है.मुझे इससे काफी आशाएं हैं.
- शुभ्रांशु चौधरी,छ्त्तीसगढ़