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मुख्य मुद्दा
"आख़िर किस ओर जा रहे हैं हम"
Posted on: 2011-05-14

उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में 2011 की जनगणना: आर्थिक विकास का दूसरा पहलू

बी0 के0 जोशी

अपनी आर्थिक विकास गाथा को बार-बार दोहराने में मषगूल उत्तराखण्ड जहां एक ओर इसे अपनी बडी़ उपलब्धि मानकर अपनी पीठ थपथपा रहा है, वहीं दूसरी ओर वर्ष 2011 की जनगणना के ताजे आंकड़ों ने कुछ ज्वलन्तशील मुद्दे हम सबके बीच खड़े कर दिये हैं। जनगणना के इन आंकडो में बच्चों के लिंगानुपात की जो तस्वीर उभर कर आयी है, उन्होंने हमें सोचने को मजबूर कर दिया है कि ”आखिर हम किस ओर जा रहे हैं ? ” और ” हम कैसे सही रास्ते पर जा सकते हैं ?”

अपने तमाम सार्वजनिक व निजी समारोहों में जहां हम आये दिन मातृषक्ति की बात करने से चूकते नहीं, वहां इस तरह के आर्थिक विकास का वास्तविक धरातल पर कोई अर्थ नहीं रह जाता। जनगणना के ताजे प्रारम्भिक आंकड़ों से निकलकर आये तीन मुद्दों पर टिप्पणी करना यथोचित होगा - जनसंख्या वृद्धि का प्रतिरुप, कुल लिंगानुपात व बच्चों (0-6 वर्ष) का लिंगानुपात। विस्तृत आंकड़े निम्न तालिका में प्रदर्षित किये गये हैं।

उत्तराखण्ड में जनसंख्या वृद्विदर, लिंगानुपात और बच्चों का लिंगानुपात:

जनगणना 2011    जनपद   जनसंख्या    वृद्विदर 2001 - 2011      कुल लिंगानुपात    0-6 आयु वर्ग बच्चों का लिंगानुपात
2001 2011 2001 2011 
उत्तरकाषी 11.75 941 959 942 915 चमोली 5.60 1016 1021 953 889 रुद्रप्रयाग 4.14 1115 1120 953 899 टिहरी गढ़वाल 1.93 1049 1078 927 888 देेहरादून 32.48 887 902 894 890 गढ़वाल -1.51 1106 1103 930 899 पिथौरागढ़ 5.13 1031 1021 902 812 बागेष्वर 5.13 1106 1093 930 901 अलमोड़ा -1.73 1145 1142 933 921 चम्पावत 15.49 1021 981 934 870 नैनीताल 25.20 906 933 910 891 उधमसिंह नगर 33.40 902 919 913 896 हरिद्वार 33.16 865 879 862 869 उत्तराखण्ड 19.17 962 963 908 886 जनसंख्या वृद्धि उपरोक्त तालिका के पहले स्तम्भ के अन्र्तगत उत्तराखण्ड की 2001 से 2011 के मध्य दषकीय जनसंख्या वृद्धि दर 19‐17 दर्षायी गयी है जो राष्ट्रीय वृद्धि दर 17‐64 से अधिक है।

उत्तराखण्ड के देहरादून, हरिद्वार, और ऊधमसिंहनगर जनपदों में यह वृद्धि दर 30 प्रतिषत से अधिक व नैनीताल में 25 प्रतिषत से अधिक रही है। चम्पावत व उत्तरकाषी में यह दर अन्य पर्वतीय जनपदों से अधिक (क्रमषः15‐5 एवं 12 प्रतिषत) रही है। बाकी अन्य सात पर्वतीय जनपदों में जनसंख्या की वृद्धि दर अपेक्षाकृत न्यून अर्थात 5 प्रतिषत और उससे कम है। इसमें से दो जनपदों अल्मोड़ा व गढवाल में वृद्धि दर ऋणात्मक रही है। नैनीताल और उत्तरकाषी को छोड़कर बाकी उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले जनपद पूरी तरह मैदानी भाग में स्थित हैं। देहरादून जनपद की पूरी दून घाटी में जनसंख्या की बहुलता है। नैनीताल के सन्दर्भ में भी यही बात लागू होती है, जहां इसके पाद प्रदेष में बसे हल्द्वानी-काठगोदाम,रामनगर व लालकंुआ जैसे नगरीय केन्द्रों के अलावा भाबर इलाके में भी जनसंख्या का बसाव सघन रुप में मिलता है।

पर्वतीय जनपदों में जनसंख्या वृद्धि कम कम होने व मैदानी जनपदों में जनसंख्या वृद्धि अधिक होने से इस बात का संकेत मिलता है कि पर्वतीय इलाकों से प्रदेष के मैदानी इलाकों अथवा अन्य प्रदेषों को तेजी से पलायन हो रहा है। साथ ही मैदानी इलाकों में बढ़ती आर्थिक गतिविधियों तथा औद्योगिकीकरण की वजह से यहां प्रदेष के बाहर से आने वाले लोगों के कारण भी जनसंख्या बढ़ी हो सकती है। पन्तनगर,हरिद्वार व देहरादून में औद्योगिक आस्थानों की स्थापना से यहां रोजगार के पर्याप्त अवसर प्राप्त हो रहे हैं,षायद इसी कारण से प्रदेष के बाहर के लोग भी आकर्षित हो रहे हैं। लिंगानुपात जनगणना के आकड़ों को देखने पर हम पाते हैं कि उत्तराखण्ड में 2001-2011 के मध्य कुल लिंगानुपात की स्थिति लगभग यथावत है। 2001 में जहां प्रति हजार पुरुषों पर 962 महिलाएं थीं वहीं 2011 में यह आंकडा़ आंषिक रुप से बढ़कर 963 हो गया। वर्ष 2011 में सम्पूर्ण भारत में प्रति हजार पुरुषों पर 940, हिमाचल में 974 व उत्तरप्रदेष में 908 महिलाएं है।
 
उत्तराखण्ड के जनपद स्तर पर लिंगानुपात का मिला-जुला प्रतिरुप दिखायी देता है। उत्तरकाषी,चमोली,रुद्रप्रयाग,टिहरी, देहरादून ,नैनीताल ,ऊधमसिंहनगर व हरिद्वार जनपदों के लिंगानुपात में वर्ष 2001 की तुलना में सुधार आया है। जबकि षेष जनपदों गढ़वाल,पिथौरागढ़,बागेष्वर,अल्मोड़ा और चम्पावत में लिंगानुपात की स्थिति बदतर हुई है। जनपद टिहरी व नैनीताल में लिंगानुपात की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिलता है, जबकि उत्तरकाषी,,ऊधमसिंहनगर व हरिद्वार में यह सामान्य व चमोली व रुद्रप्रयाग में आंषिक सुधार दिखायी देता है। दूसरी ओर जनपद चम्पावत के सन्दर्भ में एक विषेष बात देखने को मिलती है कि यहां 2001 में प्रति हजार पुरुषों पर 1021 महिलाएं थीं जो 2011 में घटकर 981 पर सिमट गयीं। जनपद बागेष्वर,पिथैारागढ,गढवाल व अल्मोड़ा में भी पुरुष -स्त्री अनुपात वर्ष 2001 की तुलना में आंषिक रुप से घट गया है। पर्वतीय क्षेत्रों में न्यून और ऋणात्मक जनसंख्या वृद्धि के साथ ही कुछ जनपदों में लिगानुपात के बढ़े आंकडे तो कुछ में घटे आंकडे साफ तौर पर यह प्रदर्षित करते हैं कि अब पुरुष के साथ उनका पूरा परिवार भी सम्भवतः पलायन कर रहा है। पहिले पहाड़ों से पलायन केवल पुरुषों का ही होता था।

अब सामान्यतः यह भी देखने में आ रहा है कि महिलाएं षादी के बाद प्रदेष अथवा उससे बाहर के मैदानी अलाकों में पलायन करने लगीं हैं। खास तौर पर इस तरह की स्थिति अल्मोडा,गढवाल,पिथौरागढ,बागेष्वर व चम्पावत में, अन्य पर्वतीय जनपदों के मुकाबले अधिक दिखायी देती है। हांलाकि इन प्रांरभिक अंाकड़ो को एकमात्र आधार मानते हुए हम पूरी तरह इस धारणा को बल नहीं दे सकते। इस सन्दर्भ में अलग से विस्तृत और ठोस अध्ययन की जरुरत होगी। बच्चों का लिंगानुपात उत्तराखण्ड के 2011 की जनगणना के सन्दर्भ में सबसे चिन्ताजनक आंकडे़ 0-6 आयु वर्ग वाले बच्चों के लिंगानुपात के हैं, जिसमें भारी गिरावट देखने में आ रही है।

उत्तराखण्ड स्तर पर 2001 की जनगणना में जहां यह लिंगानुपात 908 था वह 2011 में घटकर 886 पर पहंुच गया। हांलाकि सम्पूर्ण भारत स्तर पर और अन्य राज्यों में भी इस अनुपात में कमी आयी है पर उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में यह स्थिति ज्यादा विचारणीय लगती है। राष्ट्रीय स्तर पर यह लिंगानुपात 2001 की जनगणना में जहां 928 प्रति हजार था वहीं 2011 में यह घटकर 914 प्रति हजार पर आ गया। दूसरी ओर हिमांचल में सुखद स्थिति है। वहां यह अनुपात 896 से बढ़कर 906 पर पहुंच गया है। पिछले दषक में जहां 7 वर्ष से उपर के लोगों का लिंगानुपात 973 से थो़ड़ा अधिक 975 हो गया है जो इस बात का संकेत करता है कि 0-6 आयु वर्ग में लड़कियों की संख्या में कमाी आई है। हांलाकि राज्य स्तर के लिंगानुपात आंकडे़ ही हमें चेताने के लिये पर्याप्त हैं मगर जनपद स्तर पर आंकड़ो की जो तस्वीर उभरी है वह वास्तव में और ज्यादा गम्भीर है। वर्ष 2001-2011 के मध्य उत्तराखण्ड के सभी पहाड़ी जनपदों ने इस मामले में बदतर प्रदर्शन किया है।जनपद पिथौरागढ़, चम्पावत, चमोली,रुद्रप्रयाग,टिहरी, गढ़वाल, उत्तरकाषी व बागेष्वर में बच्चों के लिंगानुपात में अत्यधिक कमी आयी है और नैनीताल ,ऊधमसिंहनगर व अल्मोड़ा जनपदों में़ यह अनुपात कम हुआ है, जबकि बच्चों के देहरादून जनपद में अपेक्षाकृत सामान्य कमी आयी है। एकमात्र हरिद्वार जनपद में बच्चों का लिंगानुपात बढ़ा है। यहंा वर्ष 2001 में लिंगानुपात 862 था जो वर्ष 2011 में बढ़कर 869 हो गया।हांलाकि हरिद्वार जनपद में लिंगानुपात की यह बढ़ोतरी बहुत कम है लेकिन फिर भी यह परिणाम हम सबके लिये आशाजनक है।

बच्चों के लिंगानुपात की दृष्टि से मैदानी जनपदों की तुलना में पहाड़ो में जो खराब स्थिति उभर कर आ रही है उसके पीछे एक कारण सम्भवतः कन्या भ्रूण हत्या हो सकता है। बगैर ठोस आधार के इसकी पुष्टि कर पाना सम्भव नहीं है। जनपद स्तर पर बालक व बालिकाओं की जन्म सम्बन्धी सूचना व लिंगवार शिशु मृत्यु दर सूचनाओं की उपलब्धता से इन तथ्यों की पुष्टि की जा सकती है। उत्तराखण्ड में 0-6 आयु वर्ग वाले बच्चों के लिंगानुपात को देखने से प्रतीत होता है कि प्रसव पूर्व भ्रूण लिंग जांच सम्बन्धी कानून यहां निष्प्रभावी है।
 
इस सन्दर्भ में नीति निर्धारण और इसे क्रियान्वित करने के स्तर पर हम कतई गम्भीर नहीं हैं। कदाचित इसी वजह से इसमें अड़चनें आ रही हैं। अत्ः ऐसे में जरुरी है कि राज्य में सम्बन्धित आंकड़ो को आधार बनाकर कारगर अनुश्रवण प्रणाली लागू की जाय ।

बी के जोशी,
निदेशक, दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र तथा पूर्व कुलपति, कुमांयू विश्वविद्यालय, उत्तराखंड.

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