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क्या ये तक़दीर है पहाड़ की
शालिनी जोशी
मुक्क अस्मानकु द्यख्णू छोडा
बिराणा पिछाडि भगणू छोडा
उत्तराखंड अब सांस चा तुमारो
सांस हैका मा मग्णू छोडा
जात-पांत का कंडा काटा
रोजी-रोटी सबूमा बांटा
खून-पसीना बगैकि बणा
यख सोना का डांडा चांदी का कांठा
उत्तराखंड के गठन के समय पहाड के लोगों की भावनाएं और अपेक्षाएं क्या और कैसी रही होंगी लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी की इन पंक्तियों से ये बखूबी झलकता है.
एक आम पहाडी की नजर से देखा जाए तो ये एक प्रार्थना थी. आज जब 9 नवंबर को अलग उत्तराखंड के गठन के 10 साल पूरे हो रहे हैं हर किसी के मन में एक ही सवाल है कि,‘पहाड की तकदीर कितनी बदली.’ लोग यहां तक सोच रहे हैं कि उत्तराखंड का गठन पहाड के लिये अच्छा हुआ या बुरा. ये सही है कि पहाड की अपनी सरकार है,मुख्यमंत्री है,राजधानी है,लंबा –चौडा अधिकारी और कर्मचारी तंत्र है,सत्ता के गलियारों में गढवाली और कुमांऊनी बोली सुनाई दे जाती है.
लेकिन इस सब में एक आम आदमी के लिये क्या है ये एक कठिन सवाल है. गांव में स्कूल हैं लेकिन अध्यापक नहीं,अस्पताल हैं मगर डॉक्टर नहीं,बिजली के खंभे हैं लेकिन बिजली नहीं .पहाड से पलायन बढा ही है कम नहीं हुआ.जंगल कटते जा रहे हैं, नदियां सूखती जा रही हैं और पहाड की जमीन को हर साल औऱ बंजर होते जाने से हम बचा नहीं पा रहे है.
इतना जरूर है कि इन 10 सालों में पहाड को 5 मुख्यमंत्री मिले औऱ अनगिनत लुभावने नारे जैसे - देवभूमि,पर्यटन प्रदेश,हर्बल प्रदेश,जैविक प्रदेश,ऊर्जा प्रदेश आदि-आदि. लेकिन ये नारे सिर्फ छलावा साबित हुए ,इनके पीछे ठोस समझ, सुचिंतित योजना और अमल में लाने की इच्छाशक्ति नहीं थी. पहाड को अपना राज्य इसलिये भी चाहिये था कि लोग कहते थे कि लखनऊ दूर है.
लेकिन देहरादून और दूर हो गया है.पहाड का आदमी जब कोई काम लेकर लखनऊ जाता था तो उससे सहानुभूति होती थी.वहीं देहरादून में आकर सुदूर पिथौरागढ या चंपावत से आया पहाडी घिस-घिस कर रह जाता है उसके काम नहीं होते. अगर हम आकंडे देखेंगे तो सरकारें अपनी पीठ थपथपाने के कई तथ्य जुटा ही लेंगी और नोबल पुरस्कार तक के दावे होते दिखेंगे लेकिन सच्चाई से मुंह कैसे मोड़ा जा सकता.
कोई कह सकता है कि एक नये राज्य की प्रगति के लिये दस साल कम हैं लेकिन दस साल शायद इतने कम भी नहीं होते.
-शालिनी जोशी
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