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मुख्य मुद्दा
दस सालः कमज़ोर होते गांव और ये ख़ामोशी
Posted on: 2010-11-06

तन्मय ममगाई

उत्तराखंड के दस बरस पर दुष्यंत कुमार का शेर याद आ रहा है दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों तमाशबीन दुकान लगाकर बैठ गए. जिन लोगों कि चिंता थी जिन का जूनून था, वो जो सडक पर थे, दुकान मैं थे, बहस मैं थे, जो गीत गा रहे थे उन्होंने शायद दस बरस में अपनी नियति को स्वीकार कर लिया है इसलिए राजकाज सब राजाओं के हवाले करके अपने अपने घरों को लौट गए.जो बचे हैं वे आन्दोलन अपनी नौकरी के लिए ही करते हुए नजर आते हैं लिहाजा वे तो नहीं ही हुआ जिसकी बात चली थी इसलिए ही कहीं न कहीं पहाड़ के उस अंतिम आदमी कि तकलीफ हक और भविष्य कि बात शायद अधूरी रह गयी.

पहले पहाड़ और मैदान के विकास और उनके नीतिगत मतभेद पर हजारों पन्ने रंगने वाले हम लोग अब इस पहाड़ के भीतर एक मैदान को बनते हुए देख रहे हैं पहाड़ी प्रदेश के नाम पर अगर कुछ वास्तव में बदला नजर आता है तो हमारे हिल स्टेट का मैदानी भाग .प्रश्न जस का तस है .जिस पहाड़ के गाँव के आदमी के मैदान के होटलों मैं बर्तन मांजने कि चिंता करते हम नहीं थक रहे थे आज वो अगर फरीदाबाद या दिल्ली नहीं जा रहा है तो देहरादून हरिद्वार उधमसिंहनगर या हल्द्वानी जा रहा है.

गाँव वहीँ हैं वैसे ही हैं जैसे हमारी चिंताओं के उपजने से बहुत पहले थे. जो लोग वहां हैं वो हमेशा कि तरह ज्यादातर वो ही है जिनके पास वहां से निकल पाने के न्यूनतम अवसर भी नहीं है. जिस money order economy की बात आज से बीस साल पहले की जाती थी वो आज केवल इसलिए ही नहीं हो रही है क्योंकि वो बासी हो चुकी है जबकि वही सवाल बिना किसी उत्तर के आज भी वहीँ कायम है.
 
एक रिपोर्ट बताती है कि राज्य बनाने से पूर्व के दस बरसों में जितने गाँव पूरे उत्तराखंड परिक्षेत्र में खाली हुए राज्य बनने के बाद के दस बरसों में उसके आधे तो अकेले रुद्रप्रयाग जिले में ही खाली हो गए.बाकि जिलों के आंकडे अभी सामने नहीं आ रहे हैं पर इतना तय है आंकड़ों से कहीं ज्यादा भयावह वो हकीकत है जो धरातल पर है आखिर क्या कारण है कि सभी धानी देहरादून हो गया है. राज्य बनकर क्या बना हैं एक देहरादून एक हरिद्वार और एक उधमसिंह नगर आखिरकार,
 
नरेन्द्र सिंह नेगी और गिर्दा ने पहाड़ के गाँव पर बतेरे गीत गा लिए देश के चोटी के पर्यावरणविद पहले ही यहाँ पैदा होते रहे हैं वे भी कुछ कह ही रहे हैं फिर भी पहाड़ के गाँव से मनुष्य का सम्बन्ध है कि लगातार टूट रहा है. यूँ तो गाँव और शहर के बीच का ये द्वन्द राष्ट्रव्यापी है पिछले सेन्सस बताता हैं की २०००-२०१० में पूरे देश में करीब दस करोड़ लोग गाँव से शहर की और रुख कर चुके हैं. शहर रोज नए मुहावरे गढ़ रहा है सब कुछ शहर में है गाड़ी, बंगला, सड़क, टीवी, फिल्म, पैसा और गाँव में वो ही है जो शायद आज से तीस बरस पहले था.

इस भीषण अंतर्द्वंद में गाँव लगातार हार रहा है और शायद आगे भी हारेगा .हम शहर बना रहे हैं हम शहर बनाना चाहते है हमारे जेहन में शहर ही है विकास की सीडी. गाँव का बसना अब पुरानी बात है, गाँव की परिभाषा वही है जो बरसों पहले थी और शहर रोज नयी परिभाषा के साथ आ रहा है.गाँव कि वास्तविक परिभाषा क्या है उसे कौन गड़ेगा. उत्तराखंड के सन्दर्भ मैं कहें तो सबसे खतरनाक बात है कि हमारे गाँव के लगातार कमजोर होते चले जाने पर छाई हुई ख़ामोशी.

न पिछले चुनाव मैं और ना ही आज कोई भी राजनैतिक दल इस पर बात करता या कोई प्रभावी विकल्प देता नजर आता है. आप देखिये कि उत्तराखंड में पिछले लोकसभा चुनाव मैं पौड़ी और हरिद्वार लोकसभाओं मैं औसतन तीन लाख लोग बढ़ गए . ये कौन लोग हैं कहाँ से आये हैं और क्यों आ गए हैं गंभीरता से देखें तो .एक भीषण आन्तरिक पलायन आकर ले रहा है.इसका सबसे दुखद पहलु ये है कि जो लोग उतर रहे हैं वे या तो वो हैं जो थोड़ी सी बेहतर स्थिति में हैं या तो वो है जिसके पास कोई रास्ता नहीं बचा यानि किसी भी स्तर का आदमी पहाड़ के गाँव में रहना नहीं चाहता हैं या गाँव के पास ऐसा कुछ नहीं है जो किसी भी स्तर के मनुष्य को कुछ दे सके. मतलब गाँव में न रहने के वो ही कारण हैं, जितने शहर में रहने के हैं .

जिन जमीनों ने मैदानी इलाकों में इंसान का जीवन स्तर बदल दिया है वो ही जमीन गाँव में पीढ़ियों से संभाली जाने के बाद अचानक बेमानी हो गयी है कई पीढ़ियों की मेहनत का कोई मोल नहीं रहा. हमारी भूमि चूँकि हमें कोई आधार नहीं दे रही है सो एक आधारहीन या एक कमजोर मानव संसाधन हम पैदा कर रहे हैं क्या कारण है राजनैतिक, भौतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सभी कारणों की पड़ताल की जानी चाहिए. हमारे पास गाँव के लिए कुछ करने के नाम पर सड़क बिजली जैसे पिटे पिटाए मुहावरे हैं जबकि जिन गाँव में ये सब कुछ भी है वहां से लोग अधिक विस्थापित हुए हैं.

फिर हमारे पास क्या विकल्प है उत्तर शायद इतना सरल नहीं अगर कुछ है तो उसे ढूँढने की शिद्दत और इच्छाशक्ति चाहिए.जो इन दस बरसों में नहीं दिखाई दी पर कुछ बातें तय है की बस सुविधाओं को इकठ्ठा कर देने भर से गाँव नहीं बचेंगे क्योंकि ये सुविधाएं तो शहर में हर हाल मे बेहतर ही होंगी इसलिए नए दौर में नयी परिभाषा के साथ आगे आने की जरुरत हैं. आज जब हर तरफ विकास दर कि बात चलती है तब ये जानना जरुरी है कि पहाड़ के गाँव कितने उत्पादक हैं और उनकी उत्पादकता का विकास प्रतिशत क्या हैं. उसके विकास और उत्तरजीविता को तय करने के क्या मानक हैं उनके लिए सरकारों के जेहन मैं क्या है और वो कितना व्यावहारिक है.
 
चिंता की बात ये है गाँव का लगातार अनुत्पादक होते चले जाना न केवल उन्हें ख़तम कर रहा है बल्कि अगली पीढी को भी एक खोखला आधार दे रहा है इसलिए किसी भी उपलब्धि और बेहतर भविष्य की बात तब तलक बेमानी है जब तक राज्य कि ज्यादातर भूमि अनुत्पादक बनी रहेगी.हमारे खेत क्या उगायें कैसे उगायें, हमारे वास्तविक संसाधन क्या हैं हमारे गाँव नाम की स्थापना अगर जीवित रहे तो कैसे और इसे क्यों जीवित रहना चाहिए जैसे कई सवाल है. इसलिए एक बार फिर उस मुद्दे पर बहस होनी चाहिए जिसकी चिंता की बात पर इस राज्य के निर्माण की बात चली थी.
 
संस्कृतिकर्मी और पहाड़ी सरोकारों के एक्टिविस्ट तन्मय ममगाई ने हिलवाणी के अनुरोध पर  ये लेख भेजा है. धाद संस्था के संस्थापक सदस्यों में एक तन्मय ममगाई पहाड़ के मुद्दों पर लगातार सक्रियता से काम करते रहे हैं. विभिन्न सांस्कृतिक तरीक़ों से वो और धाद टीम पहाड़ के सवालों को उठाते रहे हैं.

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Comments

Pradeep Bahuguna Darpan2010-11-06 04:44 AM
Tanmay ji ko is lekh ke liye sadhuwad. Aapki lekhni isi tarah dhad lagati rahe....
Dr. Dinesh Sati2010-11-06 06:46 AM
Thanks Tanmay ji for rightly appreciating the declining productivity of hill agriculture which seems to be one of the reasons for migration of local community to the places like Dehra Dun. we realy need a comprehensive debate/ reforms in this area!
Subhash Lakhera2010-11-06 09:56 AM
No one will disagree what Tanmay ji has said but to care for the last man in the queue, I think no political leader works for that. We are avoiding conflicts just because it make drag us back and may fix last in the queue. The life style of our leaders speaks how much they care for the so called comman man. Dev bhoomi ko kuchh log deemak kee tarah chat kar rahen hain aur ham sab log tamasaa dekh rahe hain. lekh athwa geet sirf pressure cooker kee safety valve kee tarah karya kar rahe hain aur is vajah se bhrashtachari cooker surkshit hai. Rodan aur Vilap se bat nahin banane vali hai aur Dr Lohiya se yun to main har baat par itefaak nahin rakhtaa par yah sahee hai ki \\\" Jinda kaum sau sal tak intjaar nahin kartee hain.\\\"
usha sharma2010-11-06 10:41 AM
मुख्य मुद्दा
दस सालः कमज़ोर होते गांव और ये ख़ामोशी
तन्मय जी ने इस ज्वलंत मुद्दे पर लिखकर हम सबको पहाड़ के dard पर सोचने को मजबूर कर दिया हैI पहाड़ की इस ख़ामोशी में छुपी वेदना
usha sharma2010-11-06 10:44 AM
मुख्य मुद्दा
दस सालः कमज़ोर होते गांव और ये ख़ामोशी
तन्मय जी ने इस ज्वलंत मुद्दे पर लिखकर हम सबको पहाड़ के dard पर सोचने को मजबूर कर दिया हैI पहाड़ की इस ख़ामोशी में छुपी वेदना
Subhash Rawat2010-11-07 12:50 AM
samskriyi karmiyon ne jan-jagaran ka jordar kaam karke uttarakhand rajya aandolan ko majboot banaya tha....lekin rajya ban jane se lekar aaj tak ye ehsaas bana raha ki jan-jagaran ki to ab pahle se bhi zyada zaroorat hai.....rajya ban bhar jana samsyaon ka samadhan na tha, na hai.....turant kheir khabar lete rahna zaroori tha....ye sochkar dar lagta hai ki kya ab der ho gayi hai, par phir sochta hoon utine der to nahin hui jitni ham aaj se das, bees ya pachas saal baad mahsoos karenge....ek samskriti-karmi hone ke nate soch raha hoon kahan se shuru karen?....samskritik morcha ki log bhi bikhar gaye hain....mamgain ji ki tarah aur log bhi apne apne madhyamon se ye baat karen to shayad kuchh baat banana shuru ho.
manjari2010-11-08 04:00 AM
लेखक तन्मय जी का यह लेख वास्तव में एक चिंतननीय विषय है .पर देखा जाय तो हम सभी ने अपने गाव को अनदेखा किया है .हमारी जड़े जहाँ से जुडी है हम उसी को नजरंदाज किये जा रहे है .क्यूँ की आज &#
madhuri rawat2010-11-08 02:54 PM
आज उत्तराखंड दस वर्ष का हुआ पर कितना कुछ बदला? पहाड़ के विषय में प्रत्येक जागरूक नागरिक की चिंता को वाणी दी है तन्मय जी ने.
pradeep2010-11-26 01:44 AM
tanmay ji ko aisa lekh likhne ki zaroorat he nahi padti agr hamare prades ki sthiti badhiya hoti...wastaw main pahadi rajya ki awdharna ka matlab poori tarah se samapt ho chuka hai...hamare neeti nayanta jis tarah se hamare sapno ko thikane laga rahe hain uske liya ho jyada zimmedaar hain...kyonki sakriya raajneeti ke prati hamari berukhi ne he bure logon ko satta main aane ka mauka diya hai...
aaj hamare rajya ki baagdor jin hathon main hain unhe tou rajya k naam ka theek theek uccraaan tk krna nahi aata hai...ab khud he sochiye aise log rajya ki bhawna kya khaak samajh payenge...
...hm sabhee ko chahiye ki ek naye aandolan k liya apne aap ko tayaar kr liya jaaye...asli aur nakli logon ki pahchaan zaroori hai...
pradeep2010-11-26 01:46 AM
tanmay ji ko aisa lekh likhne ki zaroorat he nahi padti agr hamare prades ki sthiti badhiya hoti...wastaw main pahadi rajya ki awdharna ka matlab poori tarah se samapt ho chuka hai...hamare neeti nayanta jis tarah se hamare sapno ko thikane laga rahe hain uske liye hm he jyada zimmedaar hain...kyonki sakriya raajneeti ke prati hamari berukhi ne he bure logon ko satta main aane ka mauka diya hai...
aaj hamare rajya ki baagdor jin hathon main hain unhe tou rajya k naam ka theek theek uccraaan tk krna nahi aata hai...ab khud he sochiye aise log rajya ki bhawna kya khaak samajh payenge...
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subhash lakhera2010-11-29 01:22 AM
(ईमेल से प्राप्त) दर्द हम सभी का एक है, केवल उसे बयां करने के तरीकों में फ़र्क होता है. उत्तराखंड राज्य की जरूरत इसलिए नहीं महसूस की गयी थी कि कुछ लोगों की विदेश दौरों या लाल ब

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