• हिलवाणी की ओर से आप सबको नए वर्ष की मंगलकामनाएँ 
  •  
  • हिलवाणी का मोबाइल फ़ोन संस्करण जल्द 
  •  
  • 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने कमर कसी 
  • मुख्यमंत्री हरीश रावत चुनाव मोड में, फिर वापसी का दावा 
  • अजय भट्ट बने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष 
  • हिलवाणी को आपकी राय और सहयोग का इंतज़ार 
युवा ज़िंदगी
दबंगई का उत्सव
Posted on: 2010-09-27

विनोद वर्मा
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में 12 सितंबर को पुलिस के जवानों ने एक सिनेमाघर के गार्ड को पीट-पीटकर मार डाला. ये जवान शहर के पुलिस कप्तान यानी एसपी साहब की सुरक्षा में लगे हुए थे.


गार्ड की ग़लती यह थी कि उसने सादे कपड़ों में सिनेमा देखने पहुँचे एसपी साहब को नहीं पहचाना और उन्हें सही रास्ते से बाहर निकलने की सलाह दे दी. जवानों को यह बर्दाश्त नहीं हुआ. यह सिर्फ़ संयोग नहीं है कि कप्तान साहब अपने जवानों के साथ फ़िल्म ‘दबंग’ देखकर निकल रहे थे. ‘दबंग’ सलमान ख़ान की नई फ़िल्म है जो 10 सितंबर को रिलीज़ हुई है. फ़िल्म समीक्षक और बहुत से सिनेमाप्रेमी इस फ़िल्म की सराहना करते थक नहीं रहे हैं.

वे प्रकारांतर से बता रहे हैं कि यह बहुत सफल फ़िल्म है, इसने हिंदी सिनेमा का एक नया व्याकरण रचा है, इसने सलमान के रुप में एक नया सुपरहीरो खड़ा कर दिया है आदि आदि. अगर 12 सितंबर को पुलिस के जवानों ने उस गार्ड को पीट-पीटकर नहीं मारा होता तो फ़िल्म की सफलता पर संदेह होने लगता. इस घटना से मन में एक आश्वस्ति का भाव उभरता है कि फ़िल्म अपना संदेश देने में सफल हुई है. यह फ़िल्म की व्यावसायिक ही नहीं बल्कि सामाजिक सफलता भी है. जिन लोगों ने यह फ़िल्म नहीं देखी है उनके लिए बता दें कि यह एक पुलिस अधिकारी पर बनी फ़िल्म है. यह अधिकारी ही ‘दबंग’ है. वह उत्तर प्रदेश के किसी स्थान पर पदस्थ है लेकिन उसमें वह सारे गुण विद्यमान हैं जिसके लिए भारत में पुलिस बदनाम है.

वह असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर है. नाम है चुलबुल पांडे लेकिन वह अपने आपको रॉबिनहुड पांडे कहता है. वह डकैतों को बहुत बहादुरी से घेरता है लेकिन उन्हें गिरफ़्तार नहीं करता. वह लूट का पैसा ख़ुद हड़प लेता है और डकैतों को छोड़ देता है. वह भ्रष्ट छुटभैये नेता को आँख दिखाता है लेकिन उसके भ्रष्ट आका से, जो प्रदेश का गृहमंत्री भी है, हाथ मिलाता है. वह अपनी तरक़्की के लिए शराब में मिलावट करके लोगों की जान ख़तरे में डाल सकता है और अपने किसी सिपाही की पदोन्नति के लिए उसे गोली मारकर झूठी रिपोर्ट लिखने की सलाह भी दे सकता है. चुलबुल पांडे राह चलते एक लड़की को एक बार देखकर उससे शादी करने का फ़ैसला भी कर सकता है.
 
वह शादीशुदा होते हुए भी शराब पीकर एक नाचने वाली एक लड़की के साथ ‘तू एटम बम हो गई मेरे लिए’ भी गा सकता है. वह अपने सौतेले पिता को ‘पांडे जी’ कहकर पुकारता है. उसके भ्रष्टाचार की कमाई उसकी सरल सी दिखने वाली माँ बहुत जतन से संभालती है. कुल मिलाकर वह सर्वगुण संपन्न है और अपने सीधे सादे भाई को मंदबुद्धि कहकर दुत्कारता रहता है. यह ऐसा समय है जब हमने टेलीविज़न की स्क्रीन पर पुलिस वालों के असली कारनामे देखे हैं, जब हम हर दिन उनके नए क़िस्सों से वाकिफ़ हो रहे हैं. कहीं छोटी चोरी के जुर्म में पकड़े जाने पर पेड़ पर लटका कर पीटते हुए. कहीं एक बच्चे को मोटर साइकिल से बांधकर घसीटते हुए. किसी गैंगस्टर की पार्टी में नाचते हुए. किसी मंत्री या मुख्यमंत्री के कहने पर फ़र्ज़ी मुठभेड़ करते हुए और भ्रष्ट नेताओं की जी हज़ूरी करके पदोन्नति पाते हुए.

यह ऐसा समय है कि एक आईपीएस अधिकारी छेड़छाड़ के लिए दोषी ठहराया जा चुका है, एक अपनी कथित प्रेमिका की हत्या के जुर्म में जेल में है तो कई फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मामले में अभियुक्त बने हुए हैं. अख़बारों की सुर्खियाँ बता रही हैं कि किस अधिकारी के यहाँ छापे में कितने –कितने करोड़ रुपयों की संपत्ति का पता चल रहा है. तो ऐसे समय में इस पात्र की रचना आश्चर्यचकित नहीं करती. जैसा कि ‘अब तक छप्पन’ का एनकाउंटर स्पेशलिस्ट नहीं करता, ‘राम लखन’ का लखन नहीं करता और ‘देव’ का पुलिस कमिश्नर नहीं करता. 'असामाजिक' की स्वीकार्यता "शायद इस बात पर कोई विचार ही नहीं कर रहा है कि एक फ़िल्म के ज़रिए ही सही हम एक असामजिक व्यवस्था को स्वीकार्यता प्रदान कर रहे हैं. बिना किसी मजबूरी के. ख़ुशी-ख़ुशी. बिलासपुर में हुई घटना को अपवाद मानना एक भूल भी हो सकती है.

हो सकता है कि मेरे-आपके शहर में कई असिस्टेंट पुलिस अधिकारियों को और उससे बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को चुलबुल पांडे की तरह दबंग बनने की इच्छा सताने लगे. तब क्या होगा?" चकित तो जनता की प्रतिक्रिया करती है जो चुलबुल पांडे के हर उस कारनामे पर ताली पीट रही है जो ग़ैर-क़ानूनी है. यह वही जनता है जिसने अन्याय से नाराज़ एक पुलिस अधिकारी को ‘ज़जीर’ में सिर पर बिठा लिया था. जिसने ‘अर्धसत्य’ में एक पुलिस वाले की कुंठा को अपने आपसे जोड़कर देखा था. ऐसा नहीं है कि इससे पहले हिंदी सिनेमा में भ्रष्ट पुलिस अधिकारी का कोई चित्रण नहीं हुआ. कई बार हुआ. लेकिन या तो वह खलनायक के रुप में दिखा या फिर फ़िल्म के आख़िरी रील आते-आते तक पटरी पर आ गया. लेकिन इस बार मामला कुछ अलग है. चुलबुल पांडे भ्रष्ट है और उसे अपने भ्रष्ट होने पर गर्व है.

वह क़ानून तोड़ता है और उसे अपना हक समझता है. एक तो वह किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है. यदि है भी तो उसे उन लोगों को भी भ्रष्ट तरीक़ों से ख़रीदने की कला आती है. सबसे बड़ी बात है कि यह सब करते हुए वह खलनायक नहीं है. नायक है. हीरो है. तर्क दिया जा सकता है कि ‘दीवार’ का हीरो भी आख़िर में शशि कपूर नहीं था, अमिताभ बच्चन था जो एक तस्कर था. ‘दयावान’ और ‘अग्निपथ’ के हीरो भी मुजरिम थे. लेकिन हमें याद रखना होगा कि उनका हश्र अंतत: वही हुआ था जो एक ग़ैर-क़ानूनी काम करने वाले का होना चाहिए. ऐसे कई और उदाहरण दिए जा सकते हैं. लेकिन ‘दबंग’ का उन सबसे अलग फ़िल्म है.

इस फ़िल्म में खलनायक की सारी ख़ूबियों वाला चरित्र पूरी फ़िल्म में नायक बना रहता है और आख़िर में भी विजेता बनकर उभरता है. वह अपने आख़िरी संवाद में भी अपने भ्रष्टाचार की स्वीकारोक्ति दोहराता है और फिर गर्व से दर्शकों की ओर देखता है. चुलबुल पांडे का सौतेला पिता कहता है, ‘यह हैप्पी एंडिंग है’. इस बार जनता एक पुलिस वाले की उन सारी हरकतों पर सीटी बजा रही है जिसे देखकर उसे बुरा लगना चाहिए. एक शराबी बाप को छुड़वाने पुलिस चौकी पहुँची एक नवयुवती को चौकी इंचार्ज के कहने पर सिपाही बारी-बारी से ऐसे अश्लील चुटकुले सुनाते हैं जिसे कोई भी व्यक्ति अपने घर पर या सार्वजनिक रुप से नहीं सुना सकता.

लेकिन जनता को ग़ुस्सा नहीं आ रहा है, मज़ा आ रहा है. कहने को चुलबुल पांडे क़ानून का रखवाला है लेकिन इस फ़िल्म में वह सरकारी क़ानून को जूते की नोंक पर रखता है और अपने क़ानून ख़ुद बनाता है. लेकिन इस पर किसी को आपत्ति नहीं है. शायद इस बात पर कोई विचार ही नहीं कर रहा है कि एक फ़िल्म के ज़रिए ही सही हम एक असामजिक व्यवस्था को स्वीकार्यता प्रदान कर रहे हैं. बिना किसी मजबूरी के. ख़ुशी-ख़ुशी. बिलासपुर में हुई घटना को अपवाद मानना एक भूल भी हो सकती है. हो सकता है कि मेरे-आपके शहर में कई असिस्टेंट पुलिस अधिकारियों को और उससे बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को चुलबुल पांडे की तरह दबंग बनने की इच्छा सताने लगे. तब क्या होगा?

सत्ता प्रतिष्ठान पहले से छप्पन छेदों वाली छलनी है. वह सब को नापता रहता है कि कौन किस छेद से पार हो सकता है. शिष्टाचार शुल्क पटाओ और छेद के पार चलो. सवाल ऐसे में आश्चर्य इस बात का है कि अच्छे ख़ासे विचारवान लोग इस फ़िल्म को मनोरंजक पा रहे हैं. पता नहीं अपनी मर्ज़ी से या फिर फ़िल्म समीक्षक की सलाह पर वे ‘अपना दिमाग़ घर पर छोड़कर’ फ़िल्म देख रहे हैं. एक पढ़ा-लिखा पत्रकार कह रहा है कि उसने सीटियाँ बजा-बजाकर यह फ़िल्म देखी. हर तरह की हिंसा से भरी इस फ़िल्म में उन्हें हिंसा नज़र नहीं आ रही है.
 
यह अंदाज़ा तो था कि समाज ने अपनी बहुत सी बुराइयों को स्वीकार कर लिया है. लेकिन यह संकेत डरावना है कि अब उसे एक लंपट क़िस्म का पुलिस अधिकारी जो सर से पाँव तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है, लोगों को मनोरंजक लग रहा है. भ्रष्ट आचरण अगर गुदगुदा रहा है तो यह कहीं यह कोई कुंठा तो नहीं? वैसे ‘दबंग’ कोई अकेली फ़िल्म नहीं है जो भ्रष्टाचार और अश्लीलता का उत्सव मना रही है. हाल ही में बनी कई फ़िल्में ‘बुरे’ का महिमामंडन करती हैं और आख़िर में औपचारिकता के तौर पर ‘बुरे का अंत बुरा’ बता देती हैं. लेकिन पूरी फ़िल्म में बुरे कर्म करने वाला व्यक्ति सामाजिक रुप से सफल दिखता रहता है. उसके पास धन और ऐश्वर्य किसी चीज़ की कमी नहीं होती.

इस कड़ी में प्रकाश झा की हाल ही में आई फ़िल्म ‘राजनीति’ का नाम लिया जा सकता है. इन फ़िल्मों को देखने के बाद भारतीय सेंसर बोर्ड की उदारता पर आश्चर्य होता है. साथ में उसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े करने को जी चाहता है. यह कहा जा सकता है कि एक फ़िल्म को लेकर इतना संवेदनशील होने की ज़रुरत नहीं है.

फ़िल्में इतनी गंभीरता से नहीं देखी जानी चाहिए. वे मनोरंजन के लिए बनाई जाती हैं और उन्हें उसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए. लेकिन ऐसा है नहीं. क्योंकि ऐसे तर्क ‘फ़ायर’, ‘वॉटर’, ‘परज़ानिया’ और ‘ब्लैक फ़्राइडे’ के समय सामने नहीं आते. ऐसा नहीं हो सकता कि एक विषय पर बनी फ़िल्म पर आपत्ति हो और दूसरी को सिर्फ़ मनोरंजन की दृष्टि से देखा जाए.

-बीबीसी पत्रकार और कथाकार विनोद वर्मा का ये लेख बीबीसी हिंदी से साभार.

Click to print the article.

Comments


Post Your Comments




Follow us on:


हिलवाणी से जुड़ें

हिलवाणी, उत्तराखंड और पहाड़ों को देखने, जानने और समझने का सीधा और सरल ज़रिया. हिलवाणी आपकी वेबसाइट है. हिलवाणी से आप भी जुड़ें. अगर आपके पास है कोई दिलचस्प समाचार,विचार या फ़ोटो तो हमें भेजें. ईमेल करें shiv@hillwani.com या shalinidun@gmail.com पर.

हिलवाणी के लिए

Very nice site. Font color should be more dark so that reading become easy. Rest is best.
Email: learnatmegatech@gmail.com
- Ajay Saxena , Dehradun, Management and Engineering Teacher

Very nice site. Font color should be more dark so that reading become easy. Rest is best.
Email: learnatmegatech@gmail.com
- Ajay Saxena , Dehradun, Management and Engineering Teacher

Fabulous site. Itís informative, thought provoking and motivating, all at the same time.
- Kishore Pandit, Dehradun

आप लोग इस साईट को लगातार सुधार रहे हैं, यह एक सुखद संकेत है. इस साईट पर आकर एक सुखद अहसास होता है. साईट को और लोकप्रिय बनाने के लिए कुछ और तेजी और आक्रामकता लाइए.
- गोविंद सिंह, हल्द्वानी

HILLWANI IS BRAND E MAGAZINE OF HILLS NOW. IT IS SURPRISING THAT U R RUNNING IT SINCE A LONG TIME WITHOUT ADVERTISEMENTS. WELL DONE.
- mukesh nautiyal, dehradun

शालिनीजी, हिलवाणी वेबसाइट बहुत अच्छी लगी. काफी मेहनत से आप लोग अपडेट रखते हैं. आप और आपके साथियों को बधाई.
- हारिस शेख, मुंबई

Hillwani seems to be a great effort towards establishing a local cybersite for the uttarakhandis. Keep it up and please keep it updating.
- पीसी जोशी, नई दिल्ली

gone through the hillwani site. Enjoyed watching photos and reading reports. Doing great job.
- हर्षवंती बिष्ट, उत्तरकाशी

एक पहाड़ी इ-पत्रिका के रूप में हिलवाणी का आना अच्छा लगा
- हेमचंद्र बहुगुणा, दिल्ली

हिलवाणी पहाड़ के सरोकारों, उम्मीदों और लक्ष्यों को सार्थक तरीके से सामने लाने की एक पेशेवर कोशिश बनी रहे, ऐसी कामना है
- रामदत्त त्रिपाठी, लखनऊ

i visted hillwani recently and find it very interesting and full of knowledge not only about news and views on my Motherland Uttarakhand but also about the major issues and problems of this Himalayan state.
- गीतेश नेगी, सिंगापुर

hillwani as VIBGYOR on mountains
- भास्कर उप्रेती, देहरादून

हिलवाणी के लिये बधाई.पहाड़ के लोगों को अपनी धरती से प्यार है.मुझे इससे काफी आशाएं हैं.
- शुभ्रांशु चौधरी,छ्त्तीसगढ़

हिलवाणी अच्छा है। इसे विकसित किया जाए तो बड़े काम का साइट हो जाएगा। थोड़ा फोटो फीचर बढ़ा दें। एक फोटो दस्तावेज़ हो सकता है। स्थानीय बोली की रचनाएं अच्छी लगती हैं।
- रवीश कुमार, दिल्ली

kamal ki site banayi hai...aisai manch ki sakht zaroorat thi...aur mitravar, aapkai saksham hathon mai hai isliye ummeedain bhi bandh rahi hain...jan,jangal, zameen kai sawal apsai badhiya kaun utha sakta hai... ...dhanonmukh patrakarita kai is yug mai janonmukh upkram ka parcham lahraya hai aapnai, aap samman ke bhagi hain, abhinandan kai patra hain.... ..pahad ke logon ki janvadi akankshaon ka gunjayman manch bane ye site,yahi kamna hai...badhai..
- प्रभात डबराल, दिल्ली

हिलवाणी एक सजग और सुरूचिपूर्ण कोशिश है.
- शैलेश कुमार, बंगलौर

उत्तराखंड पर ढेरों साइट्स हैं, लेकिन सभी आधी-अधूरी। आपकी साइट इस गैप को भरती दिखती है। उम्मीद है आप पहाड़ की उन खबरों को भी तरजीह देंगे, जो आमतौर पर अखबारों से गायब दिखती हैं। साइट में ऑडियो फंक्शन जोरदार लगा।
- राकेश परमार, देहरादून

हिलवाणी एक बहुत ज्ञानवर्धक वेबसाइट है। यहाँ हमें उत्तराखंड से जुडी हुयी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। आपका प्रयास स्तुत्य है। बस एक सुझाव देना चाहता हूँ कि यहाँ आप कुछ आलेख गढ़वाली भाषा में भी डालें क्योंकि हमारी भाषा हमारी पहचान है। पहाड़ों कि संस्कृति बचानी है तो सबसे पहले हमारी भाषा को बचाना होगा। गुणानंद पथिक जी कि गढ़वाली कविता पढ़कर अच्छा लगा।
- साकेत बहुगुणा

good work. keep it up!
- अल्मा डबराल, दिल्ली

ये सराहनीय और सार्थक प्रयास है. गढ़वाल के रीति रिवाज व संस्कृति को और ज़्यादा प्रस्तुत करने की कोशिश हो तो बेहतर रहेगा.
- दर्शन सिंह रावत, देहरादून

हिलवाणी को देखकर सुखद अहसास हुआ. अच्छा लगा कि ये काम शुरू हो पाया है.
- जगमोहन आज़ाद, नोएडा

Its good to see all our garhawal news are popping up here. It drives us towards our unforgettable memories. keep on putting your efforts so we can be updated same about our native irrespective of the part of world we are living.
- अविनाश नौटियाल

हिलवाणी के लिए हौसला बनाए रखना और स्तर बनाए रखना.
- लोकेश नवानी, देहरादून

It is a very nice portal. I could find all recent news about uttarakhand on it. And the articles were also good. Specially the "Yuva corner"
- सौरभ गर्ग, नई दिल्ली

The site appears awesome.
- लोकेश ओहरी, हाइडेलबर्ग

काव्यात्मक और कलात्मकता की संजीदगी लिए हिलवाणी पहाड़ की ज़श्न-ए-आज़ादी जैसा हो. शुभकामनाएं.
- प्रमोद कौंसवाल, दिल्ली

Hillwani is a very refreshing wbsite with all the ingredients that a good website must have. I came to know about it from one of my friends, and I'm happy to discover such a nice wesite. Keep up the good work.
- रवि शेखर, रांची

हिलवाणी को विस्तार से देखा. बहुत ख़ूबसूरत है. पहाड़ में हरियाली बहुत सुहाती है. दिन रात मारधाड़ या भाषण की ख़बरों से अलग इस तरह की चीज़ वाक़ई बहुत अच्छी लगी.
- मोहम्मद समी अहमद, मुज़फ़्फ़रपुर

साइट देखी. बढ़िया है. सुधार की गुंजाइश तो लगातार बनी रहती है. मुझे लगता है कि धीरे-दीरे कंटेंट बढ़ने पर और बेहतर होगी.
- प्रभाकर मणि तिवारी, कोलकाता

वेबसाइट अच्छी है. थोड़ी कलरफ़ुल कर दीजिए. अभी सादी लग रही है. बाक़ी शुरुआत अच्छी है.
- आभा मोंढें, बॉन

बहुत अच्छी है ये कोशिश. अच्छी लगी. दो पंक्तियों में चलता स्क्रोलर थोड़ा डिस्ट्रैक्ट कर रहा है. एक से ही काम चल सकता है.
- तस्लीम ख़ान, नई दिल्ली

हिलवाणी हमेशा गूंजती रहे. शुभकामनाएं.
- नवीन जोशी, नैनीताल

बहुत ही अच्‍छा प्रयास है सार्थक बनाये रखे.
- विमलेश गुप्‍ता, शाहजहांपुर

A timely, novel and positive effort indeed. Keep it up!
- सी के चंद्रमोहन, देहरादून

एक गंभीर प्रयास
- सचिन गौड़, बॉन

हिलवाणी के प्रयोग के लिए बधाई.
- ज़हूर आलम, नैनीताल

हिलवाणी के लिए बधाई और शुभकामनाएं
- वीरेन डंगवाल, बरेली

'हिलवाणी' बहुत अच्छी लगी - एक सुखद आश्चर्य जैसी. एक नज़र सभी पृष्ठ देख गया हूं. समाचार, कथा-कहानियां, कविताएं, साक्षात्कार, सभी कुछ तो है. बहुत सुंदर शुरुआत है.
- गुलशन मधुर, वाशिंगटन

ये वाकई बहुत अच्छी शुरुआत है. कम से कम मुझे अब ये पता चल पाया कि गुणानंद पथिक कौन थे. इसे लॉंच करने का शुक्रिया.
- दीपक डोभाल, वाशिंगटन

गिर्दा और विद्यासागर जी की आवाज़ सुनना ख़ास तौर से अच्छा लगा. मुझे विश्वास है हिलवाणी को पहाड़ की नई पुरानी पीढ़ियो का सक्रिय सहयोग और समर्थन मिलेगा.
- मंगलेश डबराल, दिल्ली

कंसेप्ट और कंटेंट बहुत अच्छा है. इन्हें बनाए रखें.
- रामदत्त त्रिपाठी, लखनऊ

वेबसाइट देखकर बहुत अच्छा लगा
- गोविंद सिंह, नई दिल्ली

वेबसाइट पसंद आई
- ललित मोहन जोशी, लंदन

अच्छी पहल, बधाई
- प्रोफ़ेसर गिरजेश पंत, देहरादून

बहुत बढ़िया शुरुआत. आला दर्जे की विविधता भरी सामग्री. बनाए रखें
- आनंद शर्मा, देहरादून

Join Us

Hillwani is an easy way to know and reach Uttarakhand and the Hills.
Hillwani is your website
Join Hillwani
If you have any news,views or photos you find interesting.
Do send us at-
shiv@hillwani.com
joshishiv9@gmail.com