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देस परदेस
ईश्वर ने नहीं रचा ब्रह्मांड-हॉकिंग
Posted on: 2010-09-03

मशहूर भौतिकविद् स्टीफ़न हॉकिंग ने अपनी नई किताब द ग्रैंड डिज़ाइन में कहा है कि ब्रह्मांड की रचना ईश्वर ने नहीं की है. भौतिकी और ग्रैविटेशन के फ़लसफ़े यूनिवर्स के निर्माण के पीछे हैं.
इसी संदर्भ में पेश है हॉकिंग का एक इंटरव्यू जिसका अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद पहल पत्रिका में 2008 में प्रकाशित हुआ था. उसमें भी हॉकिंग ने ईश्वर की निर्माता के तौर पर अनुपस्थिति की बात कही थी. पेश है इंटरव्यू के कुछ अंशः

प्रसिद्ध ब्रिटिश भौतिकविद् स्टीफन हॉकिंग का प्रस्तुत इंटरव्यू उनकी किताब black holes and baby universes and other essays से साभार लिया गया है. बैंटम बुक्स प्रकाशन से ये किताब 1993 में प्रकाशित हुई थी. इसी किताब में हॉकिंग ने ब्रह्मांड से जुड़े अपने अध्ययनों को रोचक अंदाज़ में प्रस्तुत किया है. इसमें कुछ व्याख्यान भी हैं और वो महत्वपूर्ण लेख भी जिसमें हॉकिंग ने आइंश्टाइन की दुविधाओं पर उगुंली रखी है. ये इंटरव्यू हमें न सिर्फ एक महान विज्ञानी और चिंतक के रचना संघर्ष के बारे में बताता है बल्कि ये हमें कला की उन उद्दाम ऊंचाइयों की झलक भी दिखाने की कोशिश करता है जहां संगीत और भौतिकी जैसी दो जटिल दुनियाएं एक बिंदु पर थिरकती रहती हैं.

समय का संक्षिप्त इतिहास, ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ जैसी लोकप्रिय प्रसिद्ध किताब से स्टीफन हॉकिंग दुनिया भर में एक जाना पहचाना नाम कई साल पहले बन गए थे. 1993 में दूसरी किताब ‘ब्लैक होल्स एंड बेबी यूनिवर्सेस...’ के बाद 2001 में उनकी किताब आयी ‘द युनिवर्स इन अ नटशैल.’ और इसने भी तहलका मचा दिया. रिकॉर्ड बिक्री है. यहां बताना प्रासंगिक होगा कि गैलिलियो की मृत्यु के तीन सौ साल बाद आठ जनवरी 1942 को जन्मे हॉकिंग शारीरिक रूप से अपाहिज और बोलने या चलने फिरने में असमर्थ हैं. उनके लिए एक ख़ास किस्म की चेयर तैयार की गयी है जिस पर कई अत्याधुनिक उपकरणों के साथ कंप्युटर लगा है.

हॉकिंग के कंप्यूटर को एक स्पीच सिंथेसाइज़र प्रणाली से जोड़ा गया है. हॉकिंग हाथ पर बंधे एक स्विच को संचालित कर कंप्यूटर स्क्रीन पर अंकित शब्दों के मेनू से एक एक कर शब्द चुनते हैं(सिर या आंखों की मूवमेंट से भी शब्दों को चुना जा सकता है.) जब ये काम पूरा हो जाता है और हॉकिंग जो कहना चाहते हैं वो निर्मित कर लेते हैं तब वो उसे स्पीच सिंथेसाइज़र को भेज देते हैं. वहां से फिर इस निराले विज्ञानी के विचार गूंजते हैं. इन्हें कंप्यूटर में सेव भी किया जा सकता है. इस तरह हॉकिंग दो किताबें और कई शोध पत्र प्रकाशित करा चुके हैं.

हॉकिग एक मिनट में पंद्रह शब्द बना लेते हैं. सामान्य ढंग से बोले जाने की तुलना में इस प्रक्रिया से दस गुना ज़्यादा समय लगता है. इस तरह एक अत्यंत घातक बीमारी एएलएस( amyotrophic lateral sclerosis-जिसे मल्टीपल स्कलेरोसिस यानी एमएस या मोटर न्यूरॉन डिज़ीज़) का मरीज़ और फिर न्यूमोनिया के एक घातक हमले के इलाज के दौरान आवाज़ गंवा चुका शख्स, चिकित्सा विज्ञान के दंभ को चिढ़ाता सबसे ज़्यादा चमत्कृत कर देने वाले विज्ञान यानी कॉस्मोलोजी की गुत्थियां सुलझाने में व्यस्त है. ये ज़िद इतनी इस्पाती है कि डॉक्टरों के खारिज़ कर दिए जाने के बावजूद हॉकिंग न सिर्फ अच्छे भले हैं बल्कि उनके तीन बच्चे भी हैं. जबकि धुरंधर न्यूरोसर्जनों का दावा था कि अगर महोदय बच भी गए तो बच्चे किसी सूरत में पैदा नहीं कर सकते. हॉकिंग का एक पोता भी है. 

 
स्टीफन हॉकिंग, आपको इतने सारे सम्मान मिले,, और इस बात का विशेष उल्लेख ज़रूरी है कि आप कैंब्रिज में गणित के लुकेसियन प्रोफेसर के पद से सम्मानित भी किए गए हैं- ये वही पद है जो आइज़ैक न्यूटन ने भी ग्रहण किया था, इस सब के बावजूद फिर भी आपने अपने काम पर एक लोकप्रिय किताब लिखने का निश्चय किया, मेरे हिसाब से, महज़ एक बहुत ही साधारण वजह से. आपको पैसों की ज़रूरत थी.

मैनें सोचा था कि एक लोकप्रिय किताब से मै कुछ ठीकठाक पैसे कमा लूंगा लेकिन ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ लिखने की मुख्य वजह ये थी कि मुझे लिखने में मज़ा आया. मैं पिछले पच्चीस साल में हुई खोज़ों के बारे में उत्तेजित था और लोगों को मैं उनके बारे में बताना चाहता था. मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि ये किताब इतनी ज़बर्दस्त बिकेगी.

यकीनन, इसने सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए और बेस्ट सेलर लिस्ट में सबसे लंबे समय तक रहने का रिकार्ड भी इसी के नाम गिनीज़ बुक ऑफ रिकार्डस में दर्ज है. उस लिस्ट में ये अब भी है. किसी को अंदाज़ा नहीं कि दुनिया भर में कितनी कॉपियां बिकी होंगी लेकिन निश्चित रूप से ये संख्या एक करोड़ से ऊपर होगी. लोग ज़ाहिर है इसे खरीदते हैं. लेकिन एक सवाल बार बार पूछा जा रहा है कि क्या वे इसे पढ़ते हैं.

मैं जानता हूं बर्नार्ड लेविन उनतीसवें पेज पर अटक गए थे. लेकिन मैं जानता हूं कि बहुत से लोग और आगे गए होंगे. दुनिया भर में लोग मेरे पास आते हैं और बताते हैं कि उन्हें वो कितनी पसंद आयी. वे उसे पूरा न पढ़ पाए हों या जो कुछ भी पढ़ा हो वह समझ न आया हो लेकिन उन्हें एक विचार तो मिल ही गया है कि हम एक ऐसे ब्रह्मांड में रहते हैं जो ऐसे औचित्य भरे नियमों से संचालित है जिन्हें हम खोज सकते हैं और समझ सकते हैं. ब्लेक होल की अवधारणा ही सबसे पहले लोगों की कल्पना को भा गयी और कॉस्मोलॉजी में लोगों का रूझान फिर बना.

क्या आपने कभी उन तमाम तारामंडलियों को देखा है, यूं कहें कि ‘हिम्मत बांध कर वहां गए जहां इससे पहले कोई आदमी नहीं गया.’ अगर हां तो क्या आपको मज़ा आया.

जब मैं किशोर था तो बहुत सा साइंस फिक्शन पढ़ता था. लेकिन अब जबकि मैं इसी क्षेत्र में काम करता हूं तो अधिकांश गल्प विज्ञान मुझे सतही लगता है. अगर आपको इसे एक मुकम्मल तस्वीर का हिस्सा नहीं बनाना है तो हाइपर स्पेस ड्राइव और प्रकाश से संचालित आवाजाही पर लिखना बहुत आसान है. वास्तविक विज्ञान कहीं ज़्यादा रोचक है क्योंकि वाकई वहां यथार्थ में सब हो रहा है. भौतिकविदों से पहले गल्प विज्ञान लेखकों ने ब्लैक होल का कभी ज़िक्र नहीं किया. लेकिन अब हमारे पास उनके काफी तादाद में होने के बेहतर प्रमाण हैं.

अगर आप ब्लैक होल में गिर गए तो क्या होगा.

साइंस फिक्शन पढ़ने वाले हर शख्स को पता है कि वहां गिरने से क्या होता है. वहां गिरने से आपका कीमा बन जाता है. लेकिन ज़्यादा दिलचस्प बात ये है कि ये काले गड्ढे पूरी तरह से काले नहीं. एक स्थिर दर से वे कणों को और विकिरणों को वापस भेजते रहते हैं. इस वजह से काला गड्ढा धीरे धीरे वाष्पित होता रहता है. लेकिन अंतिम तौर पर ब्लैक होल और उसकी सामग्री का क्या होता है, ये पता नहीं चल पाया है. ये रिसर्च का एक रोचक क्षेत्र है लेकिन गल्प विज्ञान के लेखकों ने अभी तक इस पर ध्यान नहीं दिया है.

और वो आपने जिन विकिरणों का ज़िक्र किया वो ज़ाहिर है हॉकिंग रेडिएशन कहलाती है. ब्लैकहोल की खोज करने वाले आप नहीं थे फिर भी आप ये साबित कर आए हैं कि वे काले नहीं है. क्या ऐसा नहीं है कि पूर्व में की गयी इन खोजों की बदौलत ही आप ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में और नज़दीक जाकर सोचना शुरू कर पाए.

ब्लैकहोल में बदलने के लिए एक तारे का सिकुड़ना कई मानों में ब्रह्मांड के फैलाव का उलट काल है. एक तारा एक निचले घनत्व वाली अवस्था से बहुत ऊंचे घनत्व वाली अवस्था में विघटित होता है. और ब्रह्मांड एक बहुत ऊंचे घनत्व वाली अवस्था से निचले घनत्वों में फैलता जाता है. एक बहुत अहम अंतर ये है कि हम ब्लैक होल के बाहर और ब्रह्मांड के भीतर हैं. लेकिन दोनों की एक विशेषता है-तापीय विकिरण(थर्मल रेडिएशन). आप कहते हैं कि ब्लैक होल और उसके माल असबाब का अंतिम तौर पर क्या होता है, ये नहीं मालूम किया जा सका है.

लेकिन मुझे लगता है कि आपकी थ्योरी ये है कि जो कुछ भी ब्लैकहोल के भीतर हुआ, जो कुछ भी उसमें अदृश्य हुआ, चाहे वो एक अंतरिक्षयात्री क्यों न हो, वो सब आखिरकार हॉकिंग रेडिएशन के रूप में पुनर्चक्रित(रिसाईकिल) हो जाएगा.

अंतरिक्ष यात्री की द्रव्यमान ऊर्जा, ब्लैक होल से उत्सर्जित विकिरण के तौर पर रिसाईकिल होगी. लेकिन अंतरिक्षयात्री खुद या जिन कणों से वो निर्मित है, वे ब्लैक होल से नहीं निकल पाएंगे. इसलिए सवाल ये है कि उनका क्या होता है. क्या वे नष्ट हो जाते हैं या वे अन्य ब्रह्मांड में निकल जाते हैं. यही वो बात है जो मैं शिद्दत से जानना चाहता हूं, इसका मतलब ये नहीं कि मेरा इरादा उस काले गड्ढे में कूद जाने का है.

स्टीफन, क्या आप किसी पूर्वाभास(इंट्यूशन) के तहत काम करते हैं- कहने का मतलब ये कि आप किसी ऐसी थ्योरी तक पहुंचते हैं जिसे आप पसंद करते हैं और जो आपको आकर्षित करती है और फिर आप उसे साबित करने में जुट जाते हैं. या एक वैज्ञानिक के तौर पर आपको हमेशा एक नतीजे की तरफ का रास्ता तार्किक ढंग से तय करना पड़ता है और आप पूर्वानुमान लगाने की कोशिश का जोखिम नहीं उठाते.

मैं पूर्वाभास पर बहुत भरोसा करता हूं. मैं किसी नतीजे का अनुमान लगाने की कोशिश करता हूं. लेकिन फिर मुझे वो साबित करना पड़ता है. और इस अवस्था में, कई बार ये पाता हूं कि जो मैने सोचा था वो सच नहीं है या मामला असल में कुछ और है जिसके बारे में मैंने सोचा ही नहीं था. इसी तरह मैने ये पाया कि ब्लैक होल या काले गड्ढे पूरी तरह से काले नहीं हैं. मैं कुछ और साबित करना चाहता था. 

आपके सिद्धांतो का अति सरलीकरण करने के लिए और मुझे उम्मीद है स्टीफन आप मुझे इसके लिए क्षमा करेंगे, कि आप एक दौर में मानते थे जैसा कि मुझे समझ आता है कि उत्पत्ति का एक बिंदु है- महाविस्फोट. लेकिन आपने आगे कभी ये नहीं माना कि यही मामला था. अब आप मानते हैं कि कोई शुरूआत नहीं थी और न ही कोई अंत है, और ये कि ब्रह्मांड स्वनिर्धारित है. क्या इसका मतलब ये है कि उत्पत्ति जैसी कोई घटना नहीं हुई थी और इसीलिए ईश्वर की कोई जगह नहीं है.

जी हां आपने अति सरलीकृत कर दिया है. मैं अब भी ये मानता हूं कि वास्तविक समय में ब्रह्मांड का प्रारंभ था, महाविस्फोट के रूप में. लेकिन एक दूसरी तरह का समय भी है, काल्पनिक समय, जो वास्तविक समय के समकोण पर अवस्थित है जिसमें ब्रह्मांड का न प्रारंभ है न ही अंत. इसका अर्थ ये हुआ कि ब्रह्मांड की शुरूआत कैसे हुई, ये तय होगा भौतिकी के नियमों से. किसी को ये नहीं कहना पड़ेगा कि ईश्वर ने किसी ऐसे निरंकुश तरीके से ब्रह्मांड की रचना की जो हमारी समझ से बाहर है. ये इस बारे में कुछ नहीं कहता कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं- इतना बताता है कि ईश्वर मनमानी नहीं कर सकता.

अगर इस बात की संभावना है कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है तो फिर आप उन चीज़ों के बारे में क्या कहेंगे जो विज्ञान से इतर हैं- प्रेम, विश्वास जो लोगों में रहता है और जो उनमें आपके लिए है और यकीनन आपकी अपनी प्रेरणा से भी जुड़ा है.
 
प्रेम, विश्वास और नैतिकता भौतिकी की अलग कैटगरी में आते हैं. आप भौतिकी के नियमों से ये नहीं बता सकते कि किसी आदमी को कैसा व्यवहार करना चाहिए. लेकिन ये उम्मीद की जा सकती है कि भौतिकी और गणित के तर्कसंगत विचार, नैतिकता को व्यवहार में लाने में किसी का मार्गदर्शन कर सकते हैं.

लेकिन मेरे ख्याल से कई लोग ये मानते हैं कि आपने असरदार ढंग से ईश्वर की खिल्ली उड़ाई है. तो फिर क्या आप इस बात को नकार रहे हैं.

जो कुछ भी मेरे काम ने दिखाया है उसमे ये है कि आपको ये नहीं कहना पड़ता कि ईश्वर की मनमर्जी से ब्रह्मांड प्रकट हुआ. लेकिन आपके पास तब भी एक सवाल रहता है-‘फिर भला ये ब्रह्मांड अस्तित्व में क्योंकर है’. अब ये सवाल ऐसा है कि आप चाहें तो इसका जवाब देने के लिए ईश्वर की परिभाषा गढ़ सकते हैं.

-अनुवादः शिवप्रसाद जोशी

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Comments

arvind2013-09-22 02:49 AM
great person Stephen Hawking ...

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