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क़ाग़ज़ का नक्शा भर नहीं है देहरादून
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देहरादून को याद कर रहे हैं युवा कवि और संस्कृतिकर्मी विजय गौड़ अपने ख़ास अंदाज़ में. उनकी स्मृतियों के देहरादून में समाज राजनीति और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के बारीक ब्यौरे हैं.
क़ागज़ पर खींच दिये गये नक्शे की शक्ल में देहरादून को दिखा पाना मेरे लिए असंभव है। रेखांकन करने का वो हुनर जो हुबहू नहीं तो कुछ आभासीय-सा भी आकर गढ़ पाये, मेरे पास नहीं। एक ड्राफ्ट्समैन वाली समझ तो कतई भी नहीं। मौसम के बारे में कहूं तो हर बार के मौसम मुझे गये सालों के मौसम से ज्यादा तीखे ही दिखायी दिये और वही आम उक्ति- ‘इस बार गर्मी बड़ी तीखी है/ बारिस भी हुई इस बार ज्यादा/ और ठंड भी पड़ी पहले से अधिक,’ मैं भी दोहराता ही रहा। इतिहास की पाठ्य पुस्तकें, जिन्हें पढ़कर प्राप्त हुआ सरकारी मोहर लगा कागज ही मेरे पास है, वो समझ दे ही नहीं पायीं कि किसी भी जन जीवन के विकास को क्रमवार विश्लेषित कर पाऊं। फिर जिन पाठ्य पुस्तकों को मैंने पढ़ा उनमें देहरादून तो क्या देश भर के कितने ही अनगिनत इलाकें हैं जिनका उनमें कोई जिक्र ही नहीं रहा।
ऐसे में आये दिन तेज गति से बदल रहे देहरादून के भूगोल और भूगोल के साथ-साथ बदल रही माहौल की आबो-हवा को समझ सकूं और आपके सामने भी रख भी पाऊं तो अपने को अक्षम पाता हूं। स्पष्ट है यह समझ सिर्फ किताबों को पढ़ लेने भर से हासिल नहीं की जा सकती। उसे तो व्यवहार से जाना जा सकता है। और व्यवहार का मामला तो यह है कि एक हद तक उसी मध्यवर्गीय शालीनता (मानसिकता), जिसमें असहमति को खुल कर न रख पाने का दब्बूपन और उस दब्बूपन के भावों को छुपाये रखने की कला का कुशलता के साथ प्रयोग किया जाता है, में अपने को जकड़ा हुआ पाता हूं, जो देहरादून की खासियत के तौर पर चारों ओर बिखरी हुई है।
देहरादून के मिजाज में आयी यह व्यवाहारिक गड़बड़ रिटायर्टड नौकरशाहों और थैलीशाहों के लिए ऐशगाह बन गये देहरादून के कारण ही पनपी है। सरकारी मुलाजिमों के एक बहुत बड़े वर्ग ने, जिनका मासिक वेतन इस शहर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, और ज्यादा मजबूत किया है। पुश्त दर पुश्त बंटती गयी खेती की सीमित ज़मीन और अविकसित खेती की कंगाल व्यवस्था में खुद को जिन्दा रख सकने वाली रेढ़ी-ठेली वाली बाजार व्यवस्था को वैकल्पिक रुप में जब देखा जाने लगा था उस वक्त के देहरादून और आज के देहरादून में एक खासा अन्तर जो दिखायी दे रहा है। वह यही कि आज जमीनों की उछाल लेती कीमतों ने उस वैकल्पिक बाजार व्यवस्था को भी बेदखल करना शुरु कर दिया है।
राजधानी बन चुके देहरादून के सौन्दर्यकरण के नाम पर रेढ़ी-ठेली वाली इस व्यवस्था को पूरी तरह से बेदखल कर देने की कोशिश ‘माॅल’ संस्कृति के षडयंत्र का एक दूसरा पहलू है। राज्य बनने के बाद एका-एक आये जमीनों के इस उछाल में जहां एक ओर उस दौर में अपना काफी कुछ बेचकर ‘आय’ के उन तलाशे गये स्रोतों को अपनाने वाले उस दौर के युवा किसान अपने को ठगा-सा महसूस करने लगे हैं वही आज के इस दौर में बिल्डरों-भूमाफियाओं की तेजी से बढ़ती आक्रमकता का नशा अपना जाल फैलाती दलाली संस्कृति में, बाकी के बचे रह गये किसानों को अपनी ज़मीनों को बेचकर चमत्कृत दुनिया के सपने दिखाने लगा है। और इस सपने ने ही उस दौर के बाद भी बची-खुची रह गयी कुछ खेती योग्य भूमि को बीसवा, गज और फुटों की माप-जोख वाली संस्कृति में बदलकर रख दिया है।
देहरादून के वर्तमान समय में अर्थ-व्यवस्था में ‘उछाल’ का यह मायावी खेल उत्पादकता के, बेशक छोटे लेकिन स्थायी, तंत्र को तहस नहस कर उपभोगतावाद की अंधी दौड़ में चकाचैंध पैदा कर रहा है। कोई सामान्य समझ से भी कह सकता है कि उत्पादकता के अभाव में फैलने वाली यह तात्कालिक चमक क्षणिक ही साबित होगी। रुपये पैसों की वो गठरी जिसको संभालने में अभी बेशक अफरातफरी का एक माहौल दिखायी दे रहा हो पर उसके क्षरण होते ही स्थितियां एकदम साफ नजर आने लगेगीं। सरकारी महकमों के दम पर टिकी देहरादून की अर्थव्यवस्था का भविष्य तो पहले ही आये दिन बढ़ती जा रही निगमीकरण और बहुराष्ट्रीयकरण की चपेट में है।
ऐसे में पारम्परिक खेती के चावल, गन्ना और चाय के एकड़ों खेतों पर उगते जा रहे कंक्रीट के जंगलों का यह आक्रमण जल्द ही स्थानीय युवाओं के भीतर हताशा पैदा करने लगेगा। दागिस्तान के तीन खजानों का जिक्र करते हुए रसूल हमजातोव द्वारा सुनाया गया किस्सा याद आ रहा है- ‘‘किसी पहाड़िये ने अपना खेत जोतने का इरादा बनाया। उसका खेत गांव से दूर था। वह शाम को ही वहां चला गया ताकि तड़के काम में जुट जाये। यह पहाड़ी आदमी वहां पहुॅचा, उसने अपना लबादा वहां बिछाया और सो गया। वह सुबह ही जाग गया। ताकि खेत जोतना शुरू करे, लेकिन खेत तो कहीं था ही नहीं। उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई, मगर खेत कहीं दिखाई नहीं दिया। गुनाहों की सजा देने के लिए क्या अल्लाह ने उसे छीन लिया या ईमानदार आदमी की खिल्ली उड़ाने के लिये शैतान ने उसे कहीं छिपा दिया। कोई चारा नहीं था। पहाड़ी आदमी मन ही मन दुखी होता रहा और आखिर उसने घर लौटने का फैसला किया। उसने ज़मीन पर से लबादा उठाया और- हे भगवान! - यह रहा लबादे के नीचे उसका खेत।’’
देहरादून ही नहीं पूरे पहाड़ पर उग रहे ऐसे नीरस जंगलों की खबर, लबादे के नीचे ढके इन खेतों पर टिकी गिद्ध निगाहों और उनके कारनामों का बेहतरीन नमुना बन कर, ग्लोबल विज्ञापन जगत में छाती जा रही है। शिक्षा के मन्दिर के रूप में स्थापित देहरादून के बारे में मैं आज भी अपनी उसी राय पर कायम हूं, जो मैंने एक दौर में अपनी कविता बस यात्रा में रखने की कोशिश की थी- बदलते ही जा रहे हैं ईंटों के भट्ठे जगह-जगह खुले स्कूलों की तरह जबकि ताजा बनी दीवारें लगातार ढह रही हैं। राजनीति की अखाड़ेबाजी ने उम्मीदों की बजाय निराशा का माहैल रचा है जिसकी परिधि में जीवन के कार्यव्यापार के सभी क्षेत्र जकड़े हुए दिखयी देने लगे हैं।
मैं कोई इतिहासविद्ध नहीं। समय दर समय की शिनाख्त तारीखों के रूप में नहीं बल्कि दौर के रूप में ही मेरे भीतर अंगड़ाई लेती है। वैसे भी समय की नपी तुली तथ्यात्मकता शायद ही मुझे अपनी बात रखने में मद्द पहुॅचाये। दौर के हिसाब से कहूं तो साहित्य-सांस्कृतिक वातावरण में ‘टिप टाॅप’ की टंटा समिति पूरी तरह से उखड़ चुकी है। टंटाधीश, टंटाधिपति, टंटा शिरोमणि की उपाधियां से नवाजे जाने का वक्त समाप्त हो चुका है। आत्मीयता और एकजुटता का बचा हुआ बेहद सुक्ष्म और झीना पर्दा ही ‘संवेदना’ की प्रासिंगता के रूप में दर्ज किया जा सकता है।
नाटकों के क्ष्ेात्र में भी एक दौर में संलग्न संस्थाये और रंगकर्मी लुप्तप्रायः से हो गये हैं। जमीनों की खरीद-फरोख्त और मल्टीस्टोरिज की अवधारणा ने भी एक हद तक इसमें अपना रंग दिखाया है। एक दौर में रंगकर्मियों का अड्डा रही वो बिल्डिंग जिसे नेहरू युवा केन्द्र के नाम से जाना जाता था, उजड़ चुकी है। अभ्यास के लिए स्थान की अनुपलब्धता एक तर्क के रूप में स्थापित होती चली गयी है। माहौल में फैली निराशा और हताशा ने ज्यादातर को घर परिवार और बव्वों में उलझा दिया है। जिनमें थोड़ी बहुत ऊर्जा या उत्साह बाकी है, वे मेले-ठेलों के खेल में जुटे हैं या बड़े पर्दे के कल्पनालोक में गोता लगा रहे हंै। कुछ उत्साही युवा रंगकर्मियों की जमात है जो अनुभवहीनता के चलते या तो दोहराव की रहा पर है या सरकार और गैर सरकारी तंत्र के द्वारा तय किये जा रहे एजेन्डे के तहत अपनी रचनाधर्मिता में संलगन हैं।
खेलों के क्षेत्र में अखबारी उपलब्धियों के बावजूद भी महौल में उल्लास की वो चमक नहीं सचमुच जीत की खुशी देती है। हां देहरादून का फुटबाॅल कुछ-कुछ जिन्दा होता हुआ सा दिख रहा है। एक दौर में खूंटियों पर टंग चुके जूते फिर से फुटबाल खिलाड़ियों के पांवों में चरमराने लगे हैं और चमड़े को पीटने के लिए बेताब नजर आने लगे हैं। उत्तेजना और उल्लास की चमक कायम रहे। नहीं जानता कि जो कुछ भी मैने अभी तक कहा उससे देहरादून की कोई छवी बनी भी या नहीं पर यह तो कहना ही पड़ रहा है कि पहाड़ी समाज के सामूहिक विकास की स्वाभाविक जीवन शैली के खिलाफ दलाल किस्म की गतिविधियों ने व्यक्तिवाद को चरम पर पहुॅचाया है और असंवेदनशील समाज के सर्जन और विकास का बीज बोया है।
देहरादून के चरित्र को जानने-समझने के लिए, अतीत के एक हिस्से पर, मैं भी देहरादून जनपद के कवि राजेश सकलानी की इस बात से इतिफाक रखता हूं कि एक दौर था जब पहाड़ का भागा हुआ हुआ कोई नव युवक पहले से भाग आये अपने किसी साथी, नाते-रिश्तेदार के यहां शरण पाता था और महीनों-महीनों दर-दर की ठोकरें खाता हुआ अपने लिए अपनी ही कही जा सकने वाली ऐसी ही कोई शरण जुगाड़ लेता था, जो बाद में दूसरों के लिए वैसी ही स्थिति में शरणगाह बनती थी। ऐसी ही सामूहिक कार्यवाहियों ने देहरादून के चरित्र को गढ़ा है। लेकिन आज किसी के पास इतनी फुर्सत या इतनी स्थिति नहीं बची है कि वह मद्द के नाम पर भी ऐसा कर पाये।
आज का देहरादून, एक दौर में पहाड़ से भाग कर आये ऐसे ही तमाम लोगों की सामूहिक गतिविधियों का प्रमाण हैा पहाड़ के लोगों के लिए वे दिन उनके जीवन के वे स्वर्णीम दिन भी कहे जा सकते है। उन्हीं पहाड़ी बुजुर्गो की आज की युवा पीढ़ी चैधियाते माहौल में, शायद उस अतीत को याद भी नहीं करना चाहती है। कथाकार सुभाष पंत की कहानियां देहरादून के ऐसे ही अतीत का पुनःसर्जन करती हैं। अरुण कुमार असफल अपनी कहानियों में उसी छद्म की पड़ताल करते हैं जो दलाली संस्कृति का संवाहक है। नवीन नैथानी की कल्पनाओं में उछाल लेता देहरादून का ऐसा ही एक क्षेत्र ‘‘सौरी’’ के रुप में जिन्दा होता है।
कथाकार विद्यासागर नौटियाल की रचनायें, जिनमे टिहरी बार-बार अपने इतिहास को सुना रहा होता है, हमें देहरादून के इतिहास में भी झांकने को मजबूर करता है। पूरब से पहाड़ तक की स्त्री के जीवन में अवसाद के क्षणों की पड़ताल और उनको बदलने की चाह अल्पना मिश्र की रचनाओं का ताना-बाना है। अवधेश, हरजीत और कवि जी ऐसे ही देहरादून का पुनःसर्जन करते हुए हमसे विदा हो गये। हिंदी में दलित विमर्श की गुंज देहरादून से ही उठी यह एक तथ्य के रूप में रख जा सकता है। ‘सदियों का संताप’ दलित रचनाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि का पहला कविता संग्रह हैं, जिसकी खोज में दलित साहित्य का पाठक आज भी उस दर्ज पते को खड़खड़ाता है जो इसी देहरादून की बेहद मरियल सी गली में कहीं हैं।
हिंदी साहित्य के केन्द्र में तो दलित विमर्श जब स्वीकार्य हुआ तब तक कवि जी (सुखबीर विश्वकर्मा) वैसी ही न जाने कितनी ही रचनायें, जो बाद में दलित चेतना की संवाहक हुई, लिखते-लिखते ही विदा हो गये। मिथ और इतिहास के वे प्रश्न जिनसे हिंदी दलित चेतना का आरम्भिक दौर टकराता रहा उनकी रचनाओं का मुख्य विषय रहा। अग्नि परीक्षा के लिए अभिशप्त सीता की कराह वेदना बनकर उनकी रचनाओं में बिखरती रही। पेड़ के पीछे छुप कर बाली पर वार करने वाला राम उनकी रचनाओं में शर्मसार होता रहा। देहरादून की तस्वीर को रख पाऊं, मैं पहले भी कह चुका हूं, असमर्थ हूं। मैं तो साहित्य से बाहर ही नहीं निकल पा रहा हूं। जबकि स्पष्ट कहूं कि देहरादून को आकार एवं पहचान देने में फुटबालर श्याम थापा जैसे ढेरों नामी गिरामी खिलाड़ी, दंगल के उस्ताद शर्मा जी और एक दौर के वे नामी पहलवान लियाकत अली और फकीरा, राजनैतिक कार्यकर्ता समर भण्डारी और उन जैसे ही अन्य क्षेत्रों में संलग्न प्रतिबद्व साथी जगदीश कुकरेती, स्वाध्यायी राजेन्द्र गुप्ता, मिचमिची आंखों वाला वह बूढ़ा पत्रकार, चारू चंद चंदोला जिसकी आंखों की रोशनी आज भी ‘युगवाणी’ के रूप में बिखर रही है, जगमोहन रौतेला, अरविन्द शेखर, राजू गंसाई, अशोक मिश्रा आदि न जाने कितने लोगो के नाम लिये जा सकते हैं।
ऐसे बहुत से लोग जिन तक मेरी पहुॅच नहीं या जो बहुत चुपचाप सतत् कार्यवाहियों को अंजाम तक पहुॅचाने में जुटे हैं वे सारे के सारे ही देहरादून हैं और उनसे ही बनती है पहचान इस देहरादून की। कुछ के नाम जो मुझे याद पड़ रहे हैं, लिये गये अनेकों के छूट गये। लेकिन उन छूटे हुओं के नाम पाठक ले लेगें। पाठक हम लिखने वालों से ज्यादा दुनियादार हैं। हम (मैं) तो निश्चित ही एक सीमित दुनिया के बीच हूं। फिर, जैसा मेरा मानना भी है और यही सच भी है कि किसी भी भू-भाग को आकार देने में जहां एक ओर सचेत कार्यवाहियों में जुटे लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है वही नैतिक, ईमानदारी और कर्तव्यबोध के तहत अपने-अपने विशेष क्षेत्रों में जुटे लागों की भूमिका को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता।
ऐसे सामान्य लोगों ने फुटबाॅल, खो-खो, शतरंज, तीरअंदाजी जैसे खेलों में अपनी उपस्थिति दर्ज कर देहरादून की जो तस्वीर गड़ी है, उससे मुॅह फेरा जा सकता है क्या ? देहरादून के धावकों को याद करने का मन किसका नहीं होगा। ये वो क्षेत्र हैं, जिनसे कमोबेश मेरा यदा-कदा वास्ता रहा जबकि जीवन के कार्यव्यापार के न जाने ऐसे कितने क्षेत्र है जिनके बारे में न तो मेरी जानकारी ही है न जिन्हें जान पाने की मेरी क्षमता। ऐसे ही सामान्य लोग आज भी बेचैनी की स्थिति में हैं। आये दिन सड़को पर उतरने वाली महिलायें, हर गलत पर चैकन्नी निगाह रखने वाले छात्र, नौजवान, मेहनतकशों की छोटी-छोटी कोशिशंे ही इस बेचैनी को तोडे़गी। उम्मीदों के पौधे हमारे खेतों में ऐसे ही सामान्य लोगों के प्रयासों से लहलहायेगें।
उन सबसे ही सीख और समझ कर मैं देहरादून के शायद सही तस्वीर रख पाऊंगा। यह जो कुछ भी कहा गया देहरादून के बारे में, नितांत मेरी व्यक्तिगत राय का अक्श है, जो मेरी स्मृतियों में दर्ज घटनाओं और मेरे निजी अनुभवों के आकाश से उपजा है। बहुतों की राय इससे भिन्न हो सकती है। मैं उस भिन्नता का सम्मान करता हूं। वैसे भी इसे ही अन्तिम माना जाये, यह तो मैं इसलिए भी नहीं कह सकता क्योंकि मेरे ही भीतर दर्ज स्मृतियों के कोनों में अभी और भी घटनायें और भी अनुभव हैं, जिन्हें यहां पूरी तरह से रख ही नहीं पाया हूं। फिर कैसे मान लूं कि यही एक मात्र और माकूल छवी हो सकती है देहरादून की। रतन और लक्की पतंगबाज, कुसम्बरी का मांजा, भरतू और बारू की दोस्ताना-दुश्मनियों का दौर, देहरादून की रामलीलायें, गुरूबचन तांगे वाले का जीवन, रोशन हलवाई के रसगुल्ले, मैंगा राम के समोसे, देहरादून का कबाड़ी बाजार, कागजों के लिफाफे बनाने वाले लोग, सड़को में पड़े हुए गोबर को इक्ट्ठा करके कंडे थापने वाली स्त्रियां, पांच पैसे-दस पैसे वाली लाटरी के पत्ते को फाड़ कर हर क्षण भाग्य आजमाने वाले लोग, गोली वाली सोडे की बोतल का पानी बेचता वह बूढ़ा सिक्ख देश के विभाजन ने जिसको पूरी तरह से तोड़ देने के बाद भी जीवन के संघर्ष में जुटे रहने की ताकत दी जैसे ढेरों लोगों का जीवन मेरे भीतर स्मृतियों के रूप में जिन्दा है।
अभी तो नुक्कड़ नाटक आंदोलन में ‘दृष्टि’ की भूमिका। ‘दादा’ अशोक चक्रवर्ती और अरुण विक्रम राणा सरीखे अपने न जाने कितने अग्रजों के माध्यम से मैं और भी कुछ कहने को बेचैन हूं। अभी देहरादून का लघु उद्योग- बल्ब फैक्ट्रीयों का जिक्र करना बाकी है। उतराखण्ड आंदोलन का खदबदाता हुआ समय फिर से एक वैसे ही हुजूम को सड़क पर उतर आने का सपना दिखा रहा है। छात्रों का आंदोलन, जो बी.एड. के संदर्भ में शिक्षा के निजीकरण की खिलाफत को लेकर शुरू हुआ। छात्र आंदोलन का वह दौर भी जब विवेका नन्द खण्डूरी निर्विवाद रूप से छात्र नेता के रूप में स्थापित रहे। उसके बाद के दौर में वेदिका वेद सरीखे छात्र नेताओं की भूमिका जिनके रहते एस.एफ.आई. ने अपना परचम लहराया। कामरेड सुनिल चंद्र दत्ता के दौर का देहरादून भी जिसे मैंने कारखाने में जाने के बाद अपने वरिष्ठ साथी कामगारों और ट्रेड यूनियन के साथियों से जाना।
मुझे लगता है देहरादून की तस्वीर जो अभी तक और जो आगे भी लगातार मेरे भीतर दर्ज होती जाने वाली है, उसको भी मुझे कहना होगा।
-युवा हिंदी कवि और संस्कृतिकर्मी विजय गौड़ देहरादून में रहते हैं. उनका एक ब्लॉग भी है-लिखो यहां वहां.
Comments
विजय जी ने देह्ररादून की गुम हो गयी असल तस्वीर का सुंदर खाका खींचा है. मजा आ गया.अन्य नगरो पर भी ऐसा ही लिखा जाना चाहिये.
विजय भाई ,
आपके इस प्रयास को सलाम ! कुछ न कहते हुए भी बहुत सी यादों को पुनर्जीवित करने वाले आपके इस लेख की ढ़ेरों शुभ -कामनाएं ! उम्मीद है की भविष्य में भी इस तरह की कुछ और यादों
विजय भाई जिस दौर के लोगों के नाम आप ले रहे है उस दौर से मैं भी गुजरा आपने पुरानी यादें ताजा कर दी अब तो हम नमक चीनी के पीछे दौड़ रहे हैं। मगर आपके लेख ने ताजगी भर दी।
आनन्द सिæ
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