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जल जंगल
असली गंगा कौन
Posted on: 2010-08-24


जयसिंह रावत

जाने माने पर्यावरण इंजीनीयर प्रो0 गुरुदास अग्रवाल और कुछ साधू सन्तों ने उत्तरकाशी जिले में  480 मे.वा क्षमता की पाला मनेरी और 381 मे.वा. की भैरोंघाटी जल विद्युत परियोजनाओं को बन्द कराने के बाद अब गंगोत्री के नजदीक उसी क्षेत्र में बन रही लोहारी नागपाला को बन्द कराने के लिये आखिरकार केन्द्र सरकार को झुका ही दिया।

इस प्रकार सरकार जोगियों के हठ के आगे एक बार फिर नतमस्तक हो गयी लेकिन इसके साथ ही अब सवाल खड़ा हो गया है कि गंगा की दो धाराओं में असली गंगा कौन है।यही नहीं भागीरथी से लगभग दोगुनी जलराशि वाली प्रचण्ड अलकनन्दा की अनदेखी से भी गंगा की अविरलता के वकीलों के सामान्य ज्ञान पर भी सवाल उठने लगे हैं। केन्द्र सरकार ने पिछले एक महीने से अधिक समय से हरिद्वार के एक आश्रम में आमरण अनशन पर बैठे पर्यावरणविद् डा0 गुरुदास अग्रवाल और स्वामी रामदेव आदि साधू सन्तों के विरोध के आगे घुटने टेकते हुये उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री के निकट 600 मेगावाट की लोहारी नागपाला को भी बन्द करने की घोषणा कर दी।

केन्द्र सरकार के उपक्रम एन.टी.पी.सी द्वारा बनाई जा रही इस परियोजना पर लगभग 40 प्रतिशत सिविल कार्य पूरा हो चुका था और इस पर लगभग 600 करोड़ रुप ये खर्च भी हो गये थे। अब वहां बनी सुरंगों को बन्द करने पर 2000 करोड़ से अधिक खच्र करने होंगे। अग्रवाल के समर्थन में कुछ साधू सन्त हरिद्वार से लेकर दिल्ली तक मैराथऩ कर रहे थे।  धर्म के नाम पर तव्वा इतना गर्म हो और उस पर राजनीति की रोटियां न सेकीं जांये, ऐसा कैसे हो सकता है। टोगड़िया और अशोक सिंघल से लेकर लालकृष्ण आडवाणी तक गंगा को सुरंग में डालने के खिलाफ खड़े हो गये।

भले ही देश के भावी पावर हाउस के रूप में प्रचारित उत्तराखण्ड गम्भीर बिजली संकट में फंस गया है और उधार की रोशनी से राज्य सरकार काम चला रही है। लेकिन जब स्वयं लालकृष्ण आडवाणी गंगा की अविरल धारा की वकालत करने लगें तो निशंक की क्या मजाल कि वह परियोजना के समर्थन में बात करते। इसलिये मुख्यमंत्री निशंक ने भी प्रधानमंत्री से लोहारी नागपाला को भी बन्द करने की मांग कर डाली। उनके पूर्ववर्ती भुवनचन्द्र खण्डूड़ी 480 मे.वा क्षमता की पाला मनेरी और 381 मे.वा. की भैरोंघाटी जल विद्युत परियोजनाओं को पहले ही बन्द करा चुके थे।

अब सवाल उठ रहा है कि जब अलकनन्दा और भागीरथी के देवप्रयाग में मिलन के बाद गंगा की यात्रा बंगाल की खाड़ी तक के लिये शुरू होती है, तो उसकी दो श्रोत धाराओं में से केवल एक को ही गंगा मान कर बिजली परि योजनाओं का विरोध क्यों किया जा रहा है। अगर कुछ धर्मांध लोग आंखों पर पट्टी बांध कर राग अलाप रहे हैं तो तथाकथित पर्यावरण विद्वानों को अलकनन्दा के विशाल जलसंभरण क्षेत्र तथा दर्जनों ग्लशियर समूहों के विशाल पारितंत्र की संवेदनशीलता क्यों नजर नहीं आ रही है। अगर भागीरथी करोड़ों हिन्दुओं की आस्था की प्रतीक है तो अलकनन्दा का धार्मिक महत्व किसी भी दृष्टि से कम नहीं है।

मगर इस सच्चाई के बाद भी कोई भी अलकनन्दा के 195 कि.मी लम्बे मार्ग में उस पर और धौली,बिरही,पिण्डर,नन्दाकिनी और मन्दाकिनी जैसी उसकी सहायक नदियों पर प्राथमिक सर्वेक्षण से लेकर निर्माणाधीन 42 जलविद्युत परियोजनाओं का विरोध नहीं कर रहा है। अकेले अलकनन्दा पर लगभग 2200 मेगावाट की 7 बड़ी परियोजनाऐं विभिन्न चरणों में हैं। अलकनन्दा की अविरलता की बात भी नहीं की जा रही है। जबकि अलकनन्दा की प्रचण्डता जगजाहिर है और उसे बांधों या सुरंगों में बांधना इतना आसान नहीं है।

श्रीनगर गढ़वाल के पास बन रही परियाजना का काफर बांध इस साल तीसरी बार टूट गया। वह बांध मचलती और गरजती अलकनन्दा के प्रचण्ड बेग के आगे रेत की दीवर की तरह ढह जाता है। समुद्रतल से उचाई बढ़ते जाने के साथ ही पारितंत्र की संवेदनशीलता भी बढ़ जाती है। बिजली के लिये नीती घाटी और फूलों की घाटी जैसे अति संवेदनशील क्षत्रों में परियोजना निर्माण चल रहा है। मगर वहां के लिये चण्डी प्रसाद भट्ट के अलावा बाकी पर्यावरण प्रेमी खामोश हैं। जबकि 400 मेगावाट की विष्णुप्रयाग परियोजना का दंश जोशीमठ के सामने वाला चांई गांव झेल रहा है।

जोशीमठ जैसे अस्थिर लैण्डमास वाले नगर के नीचे सुरंग बन रही है। पिछले 9 महीनों से 520 मेगावाट की तपोबन विष्णुगाड परियोजना की सुरंग से अन्तःश्राव के कारण नाला बह रहा है और उचाई वाले गावों में पेयजल संकट खड़ा हो गया है। मगर डा0 गुरुदास अग्रवाल जैसे पर्यावरणवादियों को कहीं कुछ गड़बड़ नजर नहीं आता है। देवप्रयाग में गंगा की 2510 कि.मी.लम्बी यात्रा शुरू होने से पहले ही उसकी दो मुख्य धराओं में से एक भागीरथी को ही असली गंगा कहे जाने पर धर्मवावलम्बियों को ऐतराज इसलिये है क्योंकि एक तो गंगा का 65 प्रतिशत पानी अलकनन्दा से और मात्र 35 प्रतिशत भागीरथी से आता है। इसके अलावा अलकनन्दा का धार्मिक महत्व कम करने से भी लोगों की भावनाऐं आहत होती हैं।

वजह यह है कि अलकनन्दा न केवल जलराशि में लगभग दोगुनी है बल्कि उसके किनारे 5 प्रयाग है, जोकि अलकनन्दा की 5 पवित्र सहायक नदियों के उसके साथ संगम हैं। इसमें देवप्रयाग में भागीरथी, रुद्रपयाग में मन्दाकिनी, कर्णप्रयाग में पिण्डर, नन्दप्रयाग में नन्दाकिनी और विष्णु प्रयाग में धौलीगंगा जैसी विशाल जलराशि वाली सदानीराऐं मिलती है। हर साल लाखों हिन्दुओं को सर्वोच्च तीर्थ बद्रीनाथ और केदारनाथ तक यही नदी ले जाती है। बद्रीनाथ जैसा मोक्ष धाम इसी के किनरे पर है। आदि गुरू शंकराचार्य ने जब सनातन धर्म की रक्षा के लिये देश के चारों कोनों पर चार धर्मिक पीठों की स्थापना की तो उन्हें पवित्रतम् हिमालयी पीठ के लिये अलकनन्दा के पास जोशीमठ ही उपयुक्त मिला।

आप कह सकते हैं कि शंकराचार्य को अलकनन्दा में ही गंगा नजर आयी। बाद में उन्होंने अलकनन्दा की सहायक नन्दाकिनी के पास केदारनाथ में ही जल समाधि ले ली। अलकनन्दा का उद्गम सतोपन्थ ग्लेशियर है। उसी की बगल में भगीरथ खर्क है। सतोपन्थ का मतलब स्वर्ग का पन्थ या मार्ग होता है। पास में भगीरथ खर्क होने के कारण सनातन धर्मावलम्बी मानते हैं कि भगीरथ ने इसी स्थान पर तपस्या की होगी और इसी स्वर्ग के मार्ग(सतोपन्थ) से गंगा धरती पर अवतरित हुयी होगी। वैसे भी अलकनन्दा का बेग ही उसकी शक्ति या प्रचण्डता का परिचायक हैं। कुछ लोग मानते हैं कि गंगा की अलग अलग धाराऐं शिव की जटा से छिटकीं थीं उनमें एक सतोपन्थ में अलकनन्दा तथा दूसरी गोमुख में भागीरथी थी।

बहरहाल पाण्डवों को भी असली गंगा अलकनन्दा ही नजर आयी थी इसीलिये वे केदारनाथ में शिव मंदिर की स्थापना के बाद स्वर्गारोहण के लिये सतोपन्थ पर आरोहण के लिये निकल पड़े और उसी चढ़ाई के दौरान पाण्डव एक-एक कर वर्फ में गिरते चले गये। जो भी हो उत्तराखण्ड के चारधामों में जब तक केदारनाथ और बद्रीनाथ का धार्मिक महत्व ज्यादा रहेगा तब तक अलकनन्दा का भी धार्मिक बर्चस्व बरकरार रहेगा। जहां तक पारितंत्र या इकालाजी की संवेदनशीलता का सवाल है तो अलकनन्दा के इलाके में स्थिति ज्यादा चिन्ताजनक है। लेकिन संघ परिवार और गुरुदास अग्रवाल या फिर राजेन्द्र सिंह की जल बिरादरी को केवल भागीरथी की चिन्ता खाये जा रही है, ताकि बिजली परियोजनाऐं बन्द करा कर अपनी अहमियत साबित की जा सके।

अलकनन्दा जितनी बड़ी नदी है उसका उतना ही बड़ा जलसग्रहण क्षेत्र भी है। भागीरथी का कैचमेण्ट इलाका खतलिंग और गंगोत्री ग्लेशियरों के बीच है। जबकि अलकनन्दा का श्रोत्र इलाका पिण्डारी से लेकर सतोपन्थ ग्लेशियरों के बीच फैला है। हाल ही में कइ्र विशेषज्ञ संस्थानों के अध्ययन दल द्वारा प्रधानमंत्री को सौंपी गयी रिपोर्ट के अनुसार अलकनन्दा के कैचमेंट क्षेत्र में कुल 427 ग्लेशियर हैं, जबकि गंगोत्री के क्षेत्र में केवल 238 और यमुना बेसिन में तो मात्र 52 ही ग्लेशियर हैं। काली नदी के कैचमेण्ट या जलसंभरण क्षेत्र में 250 ग्लेशियर मौजूद हैं।

इस लिहाज से भी अलकनन्दा कैचमेंट सबसे महत्वपूर्ण है और इसके ग्लेशियरों के पीछे खिसकने की गति भी विभिन्न अध्ययनों में अधिक दर्ज की गयी है। इसलिये पर्यावरणविद् भागीरथी से अधिक अलकनन्दा को संवेदनशील मान रहे हैं। चण्डी प्रसाद भट्ट आदि उच्च स्तरीय अध्ययन दल के सदस्यों द्वारा केन्द्र सरकार को सौंपी गयी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सतोपन्थ 1962 से लेकर 2005 तक 993दशमलब 88 मीटर वर्गमीटर से अधिक पीछे खिसक गया।इस हिसाब से सतोपन्थ के सिमटने की गति 22 दशमलब 88 आंकी गयी है। अलकनन्दा की सहायक पिण्डर के श्रोत पिण्डारी की पीछे खिसकने की गति 23.47 मीटर प्रति वर्ष है, जबकि गंगोत्री के पीछे खिसकने की गति 18.8 मीटर प्रतिवर्ष है।पिण्डारी ग्लेशियर 1845 से 1906 के बीच कुल 1600 मीटर तथा 1906 सेलेकर 1958 तक 1040 मीटर पीछे खिसका है।

इसी तरह यमुना के मुख्य श्रोत टौंस नदी के श्रोत जौंडार बामक की पीछे खिकने की गति 37 मीटर प्रतिवर्ष दर्ज की गयी है। दरअसल पर्यावरणवादी नेता सुन्दरलाल बहुगुणा ने एक बार टिहरी बांध को विरोध शुरू किया तो वह बांध बन जाने के बाद भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। बहुगुणा के विरोध से भले ही शैकिया प्र्यावरणवादियों ने सीख ली हो और कुछ धर्मांन्ध लोगों को विरोध का एक बहाना मिल गया हो मगर उसकी कीमत तो अन्ततः पूरे राष्ट्र को परियोजना लागत में भारी वृद्धि के रूप् में चुकानी पड़ी। इसकी असली मार उस आम उपभेक्ता पर पड़ी जिसे मंहगी बिजली का उपयोग करना पड़ रहा है। लोहारी नागपाला या पाला मनेरी या फिर किसी भी बन्द पड़ी अन्य बिजली परियोजना को एक न एक दिन जरूर शुरू करना पड़ेगा। क्योंकि देश की बढ़ती उर्जा जरूरत को पूरा करने के लिये इसके सिवा कोई विल्प नहीं रहेगा। लेकिन उस विलम्ब से इन परियोजनाओं की लागत कइ्र गुना अधिक बढ़ जायेगी।

आपको याद होगा कि शुरू में टिहरी बांध परियोजना की लागत मात्र 600 करोड़ थी जो कि इसके चालू होने तक 9000 करोड़ तक चली गयी। यही 304 मेगावाट की मनेरी भाली का भी हुआ कुछ ही सालों के विलम्ब से उसकी लागत 1200 करोड़ से बढ़ कर 2200 करोड़ तक चली गयी। ताजा परियोजनाऐ तो अनिश्चित काल के लिये ठण्डे बस्ते में चली गयीं। उस विलम्ब से जो अपूरणीय क्षति होगी उसकी भरपाई न तो गुरुदास अग्रवाल करेंगे और ना ही रामदेव उस क्षति का मुआवजा दे सकेंगे। देखा जाय तो इसमें ज्यादातर नाम कमाने के लिये परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं।

कहा जा सकता है कि ज्यादातर परियोजनाऐं पुरस्कारों की हवस का शिकार हो गयी हैं। विडम्बना यह भी है कि जिनको सबसे ज्यादा बिजली चाहिये वे ही परियोजनाओं का ज्यादा विरोध कर रहे हैं।

-जयसिंह रावत



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Comments

Ashish Uniyal2010-09-23 08:25 AM
Aapki lekhani ka mein hamesha se kayal hoon. hillwani mein parh kar achha lag.

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