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कथा कविता
स्मृति गिर्दाः प्रतिरोध की एक लोक धुन
Posted on: 2010-08-23


गणेश रावत

वी दिन हम नी हुलौ लेकिन वी दिन हम लै हुलौ......... ओ जैंता इक दिन तो आलौ दिन यौ दुनि में.............


पहाड़ की एक जानी-पहचानी आवाज सदा के लिए खामोश हो गई। वो आवाज जिसने पहाड़ के दुरूह भूगोल और विशिष्ट सामाजिक ताने-बाने से निकलकर अपनी एक अलग पहचान बनायी थी। जिसमें पहाड़ का दर्द समाया था और उस दर्द से मुक्ति के लिए संघर्ष की छटपटाहट भी।......गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ अब हमारे बीच नहीं रहे। हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल में उन्होंने रविवार 22 अगस्त 2010 की दोपहर आखिरी सांस ली और तमाम चाहने वालों को गमगीन माहौल में अपनी स्मृतियों के साथ छोड़कर चले गए।

गिर्दा के निधन से उत्तराखंड के साहित्यकार, पत्रकार, रंगकर्मी, आंदोलनकारी और जनसरोकारों से जुड़े लोगों में गहरे दुख की लहर है। आंतों में गंभीर बीमारी के चलते उन्हें परसों हल्द्वानी के सुशीला तिवारी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, जहां उनका आपातकालीन ऑपरेशन किया गया था। मगर डॉक्टरों की कोशिशें नाकाम साबित हुईं। गिर्दा इस दुनिया से हमेशा के लिए चले गए। 10 सितम्बर 1942 को अल्मोड़ा जिले के हवालबाग के ज्योली गांव में जन्मे गिरीश तिवारी अपने मस्तमौला स्वभाव और संवेदनशील व्यक्तित्व के कारण लोगों में ‘गिर्दा’ के नाम से जाने जाते थे। उनके पिता का नाम हंसा दत्त तिवारी और माता का जीवंती तिवारी था।

गिर्दा का अधिकांश जीवन नैनीताल में बीता मगर उनके विचारों और काम का फलक समूचे पहाड़ तक फैला हुआ था। जीवन यापन के लिए उन्होंने गीत एवं नाटक प्रभाग में अनुदेशक के पद पर नौकरी की। मगर उनके भीतर बैठे एक सजग और संवेदनशील कवि ने उन्हें सरकारी नौकरी की औपचारिकता और अकादमिकता की चैहद्दी के भीतर नहीं रहने दिया। गिर्दा के न रहने पर सबसे ज्यादा खालीपन शायद नैनीताल को होगा। आखिर नैनीताल की पहचान से जुड़ी ऐसी कौन सी नामी संस्था है, जिसके संस्थापक सदस्यों में गिर्दा का नाम न जुड़ा हो। चाहे वह प्रसिद्ध थियेटर ग्रुप युगमंच हो, पहाड़ की पत्रकारिता के लिए मील का पत्थर नैनीताल समाचार हो या पहाड़, ... गिर्दा सबकी बुनियाद में थे।

लेकिन गिर्दा की सोच और कर्म का दायरा महज नैनीताल ही नहीं, पूरा उत्तराखंड था। शायद इसीलिए उन्होंने अपने प्रसिद्ध गीत ‘आज हिमालै तुमुकैं धत्यूंछौ... जागो जागो हो मेरा लाल...’ की रचना की थी। बहुमुखी प्रतिभा के जिन्दादिल इंसान गिर्दा से अपने कॉलेज जीवन के दौरान से इन पंक्तियों के लेखक का लेखक भी कई दफ़ा रूबरू हुआ और हर बार गिर्दा को आत्मीयता और जोश से भरा पाया। विविध योग्यताओं के बावजूद उनकी सरलता, सादगी और अपनापन किसी के भी दिल को छूने को काफी था। अपने जीवन काल में उन्होंने तीन किताबों का संपादन किया, जिनमें शिखरों के स्वर, रंग डारि दियो हो अलबेलिन में और हमारी कविता के आंखर प्रमुख हैं।

प्रसिद्ध कवि वीरेन डंगवाल के शब्दों में गिर्दा लोक और शास्त्र का एक अदभुत समन्वय थे। गिर्दा को पहाड़ की लोक धुनों के सबसे बड़ा जानकार माना जाता था। चिपको आंदोलन, वन आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो, बिंदुखत्ता का भूमि आंदोलन और उत्तराखंड आंदोलन में गिर्दा ने अपनी कविताओं व गीतों से आंदोलनकारियों में नई उर्जा का संचार किया था। एक बेहतर समाज व्यवस्था का सपना देखने वाली उनकी चमचमाती आंखें अब दुनिया नहीं देख पाएंगी।

एक रंगकर्मी, जनकवि, लोक-विद् और आंदोलनकारी के रूप में पहाड़ के लोगों को गिर्दा की कमी हमेशा सालती रहेगी। उन्हीं के शब्दों में-

वी दिन हम नी हुलौ लेकिन वी दिन हम लै हुलौ.........
ओ जैंता इक दिन तो आलौ दिन यौ दुनि में.............
ओ जैंता इक दिन तो आलौ दिन वो दुनी में,
जै दिन तैर मैरो नी होलो, जै दिन नान ठुलो नी रैलो......।

-रामनगर से युवा पत्रकार और संस्कृतिकर्मी गणेश रावत का आलेख



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Comments

Shamshad Elahee Ansari "Shams"2010-08-22 03:08 PM
पहाड के लाल गिर्दा जी के निधन पर मैं अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ, फ़ेसबुक पर प्रमोद कोंसवाल जी के माध्यम से यह दुखद समाचार मिला, इस अभूतपूर्व क्षति की पूर्ति कोई शब्द नह
deepesh pandey2010-08-23 12:18 AM
Malli bakhoi, talli bakhoi, gad-ghdeyar saban lag ro niswash, patt ni kila lagun yash girda chain ash pash.
.........
ush mahan vibhuti ko mera sat sat naman va ashrupoorit sradhanjali......
Durga Nautiyal2010-08-23 12:50 AM
चाहे हम नि ले सकौं, चाहे तुम नि ले सकौं
जैंता कूई न कूई ता ल्यालु ओउ दिन यी दुनी में.....
ततुक नी लगा उदेख, घुनन-मुनई न टेक
जैंता एक दिन त आलु यो दिन ई दुनी में.....

पहाड़ के जनकवि गिë
Durga Nautiyal2010-08-23 12:54 AM
चाहे हम नि ले सकौं, चाहे तुम नि ले सकौं, जैंता कूई न कूई ता ल्यालु ओउ दिन यी दुनी में.....
ततुक नी लगा उदेख, घुनन-मुनई न टेक, जैंता एक दिन त आलु यो दिन ई दुनी में.....
पहाड़ के जनकवि गिरीश ê
kusum nautiyal2010-08-23 03:44 AM
pichle hafte hi to girda ko suna tha.dehradun mein 14 august ko swatantrarta sangram ke awsar par kavisammelan tha.girda ne khare ho kar gaya "dard aane mein vaqt nahin lagta,dard janee mein vaqt lagta hai. phir unhone lokdhun mein gaya 'aama ne saag kya chonka hai ho ho ho gaon hai mehka'.bas hindi hasya kavita ke ek saanchalak ne itna hi time diya tha girda ko.Shrota khte hi reh gaya 'girda ,uttarakhand andolan ka geet sunao. sanchalak ne nahin suna.girda ke dard ko vo hasya kavi kya janta. Girda ki dubli patli kaya baid gai.Phir vo stage se kab gaye pata nahin chala.Aur duniya se bhi chale gaye,pata nahin chala.
AApko shradhanjali girda.Apke antim shrotaon me se ek maein bhi hoon.
kusum nautiyal2010-08-23 03:45 AM
pichle hafte hi to girda ko suna tha.dehradun mein 14 august ko swatantrarta sangram ke awsar par kavisammelan tha.girda ne khare ho kar gaya \"dard aane mein vaqt nahin lagta,dard janee mein vaqt lagta hai. phir unhone lokdhun mein gaya \'aama ne saag kya chonka hai ho ho ho gaon hai mehka\'.bas hindi hasya kavita ke ek saanchalak ne itna hi time diya tha girda ko.Shrota khte hi reh gaya \'girda ,uttarakhand andolan ka geet sunao. sanchalak ne nahin suna.girda ke dard ko vo hasya kavi kya janta. Girda ki dubli patli kaya baid gai.Phir vo stage se kab gaye pata nahin chala.Aur duniya se bhi chale gaye,pata nahin chala.
AApko shradhanjali girda.Apke antim shrotaon me se ek maein bhi hoon.
pradeep2010-08-23 04:50 AM
uttarakhand ke hiton ke prati apna sab kuch arpit krne wale 'girda' hamesha hamare dil main zinda rahenge...!
...girda hamare 'prerna ke srot' hain...!
chunnilal shah2010-08-23 06:51 AM
श्री गिर्दा के रूप में एक महान गायक कलाकार और एक महान कवी की क्षति पुरे उत्तराखंड को हुई हैं , वो गोपाल बाबु गोस्वामी जी के बाद पुरे कुमाऊ के महान कलाकार थे . मैं चुन्नीलाल साह
naveen deopa2010-08-24 03:56 AM
girda kai roop mai uttrakhand kay paas ek kohinoor hira tha. des hi nani ab devbhoomi bhi kohinoor viheen ho gaya hai. girda aap bhoot yaad aaogey.........kavi kbhi deah vihin nani hota.
Sanjay Chhimwal2010-08-24 07:32 AM
Ganesh da, aapka yah lekh 'Girda' ki personality ko puri tarah se dikhata hai. Girda ke chahne walon aur anya logon ke liye nischit roop se yeh ek achha yogdan hai. lekh ke liye dhanywaad. Girda jaroor hamare beech nahi lekin wo hamare dilon main hamesha jinda rahenge. aakhir rooh mar sakti hai lekin Kavita nahi marti aur Kavi nahi marta. Girda aap Amar Hain.
govind patni2010-08-24 01:13 PM
girda shareer se hamare beech nahi rahe par wah apne geeton aur kavitaon ke madhyam se hamesha hamare saath the-hain aur rahenge.
shriram vajpayee2010-08-26 05:22 AM
jayantu te sukritino ras shidhah kaviswarah . yesham yasah kaye naasti maranajam bhayam .also to whom god loves , die young . jankavi ko naman.

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