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'गंगा स्पर्श नहीं गंगा समर्पण चाहिए'

राज, समाज और संतों के सामुदायिक प्रबंधन से ही गंगा को बचाया जा सकता है। जब तक रिवर और सीवर को अलग-अलग नहीं किया जाएगा, तब तक नदियों को साफ रखना संभव नहीं है। 'गंगा स्पर्श' सिर्फ इसलिए न हो कि हमें भी खुद को गंगा का हितैषी दिखाना है। यह कार्य तो गंगा के प्रति समर्पण के भाव से ही संपन्न हो सकता है। मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित जल पुरुष एवं गंगा बेसिन ऑथोरिटी के सदस्य डा.राजेंद्र सिंह ने रविवार को पत्रकारों से यह बात कही।
उन्होंने बताया कि तरुण भारत संघ ने श्री पांच मंदिर सेवा समिति के साथ मिलकर गंगोत्री में कचरा प्रबंधन व पुनर्चक्रण का कार्य 18 मई से आरंभ कर दिया है। इच्छा है कि उत्तराखंड की सरकार भी इसमें सहयोग करे। उन्होंने बताया कि पुराने जमाने में संत समाज गंगा को पवित्र रखने की जिम्मेदारी निभाते थे, लेकिन जबसे संतों के फैसलों की अहमियत खत्म हुई, गंगा गदंली होती चली गई। हमारी बाजारू मानसिकता ने गंगा को कचरा ढोने वाली मालगाड़ी बना दिया है।
डा.राजेंद्र सिंह ने अफसोस जताया कि सूबे की सरकार उन्हें गंगा का हितैषी न मानकर अपना दुश्मन समझ रही है और उनके अभियान में बाधाएं खड़ी करवाई जा रही हैं। गत आठ जून को रिसाइक्लिंग के लिए उनके द्वारा गंगोत्री से खच्चरों में लाए जा रहे कचरे के 18 बैगों को फॉरेस्ट से जब्त करवा लिया गया। उन्होंने कहा कि इस सरकार से उन्हें सहयोग की कतई अपेक्षा नहीं है, लेकिन कम से कम बाधा तो खड़ी न करे।
डा.सिंह ने कहा कि सरकार भले ही लाख बेरिकेटिंग लगाए, उनका अभियान थमेगा नहीं, बल्कि इससे उन्हें कार्य करने की और भी ताकत मिलेगी। उन्होंने दावा किया कि सितंबर तक उनका दल गंगोत्री को शत-प्रतिशत साफ-सुथरे कस्बे में तब्दील कर देगा। उन्होंने बताया कि पांच अक्टूबर को भोजवासा में 'गंगा संसद' प्रस्तावित है, जिसमें गंगा से जुड़े 11 राज्यों से राज, समाज व संतों के प्रतिनिधि भाग लेंगे। इसी दिन गंगा साक्षरता अभियान की शुरुआत होगी, जो राष्ट्रीय नदी स्वच्छता संग्राम को अंजाम तक पहुंचाएगा।
-जागरण याहू डॉट कॉम न्यूज़ से साभार
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