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हलचल
क्यों नाराज़ हैं खंडूरी और क्या बेचैन हैं निशंक
Posted on: 2010-06-26

बिहार की राजधानी पटना में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक और योजना आयोग उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया से मुलाकात के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ज़्यादा उत्साह में नज़र आए. बीजेपी कार्यकारिणी में उन्हें पार्टी आलाकमान से शाबासी मिली लेकिन सूत्रों का कहना है उन्हें आलाकमान को ये भरोसा दिलाने में ख़ासी मशक्कत करनी पड़ रही है कि पार्टी और सरकार में सबकुछ ठीकठाक है. निशंक जल्द ही सरकार के मुखिया के रूप में अपना एक साल पूरा करने वाले हैं. बीजेपी नेतृत्व ने हाल में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी के उस बयान को गंभीरता से लिया था जिसमें उन्होंने कहा था कि राज्य में सरकार विरोधी लहर की सुगबुगाहट देखी जा सकती है और संगठन को इसकी चिंता करनी चाहिए. मीडिया में खंडूरी के कड़े बयान उस समय आए थे जब मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक गोवा में बीजेपी मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में अपनी सरकार की उपलब्धियां गिना रहे थे.
उत्तराखंड में सत्तारूढ़ बीजेपी में आंतरिक घमासान नई बात नहीं है. 2000 में जब से राज्य बना, एक दूसरे की टांग खिचाई का कोई मौका शायद ही वर्चस्व की लड़ाई में किसी ने छोड़ा होगा. कहने को सब साथ हैं और अनुशासित हैं लेकिन आप इन नौ सालों में देंखे तो विवादों और अंतर्कलहों की लंबी फ़ेहरिस्त रही है.
2008 के चुनावों में जब भुवनचंद्र खंडूरी की अगुवाई में बीजेपी की सरकार बनी तो पहले दिन से खंडूरी की मुश्किलों का अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं था. पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने जो मोर्चा खोला, उस पर विराम लगा रमेश पोखरियाल निशंक को गद्दी सौंपकर, कोश्यारी को राज्यसभा में भेजकर. खंडूरी को जाना पड़ा.

निशंक बेखटके सत्ता चलाते रहे हैं पिछले एक साल से लेकिन अब खंडूरी लगता है फिर हरकत में आ गए हैं. और बीजेपी में कलह का प्रेत लंबी नींद सोने के बाद लगता है जग गया है.
सदी का पहला महाकुंभ ‘सकुशल’ संपन्न करा लेने से सरकार अफ़सर सब गदगद हैं. निशंक ने उत्साह में कह दिया कि कुंभ तो नोबेल का हक़दार है. कुछ दिन बाद उनका बयान आया कि कुंभ शांति नोबेल का हक़दार है. फिर कुछ दिन बाद ही पूर्व सीएम खंडूरी ने पहाड़ के अपने दौरे में कार्यकर्ता सम्मेलन में कह दिया कि कुंभ नोबेल के दायरे में नहीं आता बल्कि गिनीज़ बुक के लिए इसका नाम जा सकता है.
खंडूरी के बयान से एक बार फिर बीजेपी की कलह सामने आ गई. निशंक को सफ़ाई देनी पड़ी कि नोबेल की बात कोई वितंडा नहीं है बल्कि जायज़ और सही मांग है.
निशंक ने अपनी शिकायत भी इशारों में दर्ज कराई कि उनकी बात के निहितार्थ पर राजनीति की जा रही है.

कुंभ को नोबेल का विवाद थमा भी नहीं था कि खंडूरी ने फिर कहीं कह दिया कि सरकार के कामकाज में सबकुछ संतोषजनक कहना मुश्किल है, जनता बहुत ख़ुश नहीं है और कुछ मुद्दे हैं जो वो पार्टी फ़ोरम में ही उठाना पसंद करेंगें. खंडूरी का कुंभ निपटते ही एक महीने के भीतर ये दूसरा वाकबाण था. बीजेपी की आंतरिक खटपट के बीच खंडूरी दिल्ली भी गए. सुना गया कि वो बीजेपी के अध्यक्ष नितिन गडकरी से मिले थे.
इधर देहरादून में बीजेपी के भीतर धड़ावाद कितना सघन है इसकी बानगी मिली देहरादून में नगरनिगर मेयर के अवैद्य होर्डिग हटाओ अभियान को लेकर. मेयर विनोद चमोली अवैद्य माने जाने वाले होर्डिंगों को हटाकर दम लेना चाहते हैं लेकिन पार्टी में इसे लेकर एक राय नहीं है. पार्टी के कुछ नेताओं का आरोप है कि मेयर के अभियान में निरंकुशता की झलक मिलती है. हालत ये हुई कि बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल ने मेयर को ही डांट लगा पिला दी. मेयर चमोली आहत हैं. सूत्रों के मुताबिक चमोली, खंडूरी के ख़ास समझे जाते हैं और अटकलें हैं कि ये बड़ी लड़ाई के कुछ मोर्चों में से एक है.
मेयर से जुड़े विवाद के बीच परेशानी निशंक के लिए ही खड़ी हुई. सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा है, इसके संकेत देने वाला हंगामा इधर फिर खड़ा हुआ राज्य में जल बिजली परियोजनाओं के आवंटन में कथित गड़बड़ी को लेकर. विधानसभा में तो विपक्ष के हमलावर तेवर निशंक सरकार ने झेल लिए लेकिन ये मामला फिर खड़ा हो गया है. और कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी ने विरोध प्रदर्शन तेज़ कर दिए हैं.
प्रदेश की राजनीति के जानकार, इधर भगत सिंह कोश्यारी की ख़ामोशी पर हैरान हैं. अपने प्रशंसकों के बीच भगतदा के नाम से मशहूर कोश्यारी को कहते हैं, खिचड़ी बहुत पसंद हैं. क्या वो कोई खिचड़ी अलग से पका रहे हैं. इस पर अभी अटकलें चल ही रही थीं कि एक दिन खंडूरी और कोश्यारी की मुलाक़ात हो गई. निशंक सरकार के जल बिजली परियोजनाओं के आवंटन से जुड़े विवाद के बीच हुई इस बैठक के कई मतलब निकाले जा रहे हैं.
इस बीच जब निशंक बीजेपी के मुख्यमंत्रियों की गोवा बैठक में अपनी सरकार का चमकता दमकता रिपोर्ट कार्ड पेश कर रहे थे तो इधर खंडूरी का मीडिया में बयान आ गया कि राज्य में सरकार विरोधी लहर है. और संगठन को इस बात की चिंता करनी चाहिए.
इधर बीजेपी के निकटस्थ सूत्रों का कहना है कि इन दिनों हमेशा मुस्कराते रहने वाले प्रकाश पंत की मुस्कान इन दिनों कुछ गहरी हो गई है. वो निशंक कैबिनेट में नंबर दो की हैसियत रखते हैं. सिंचाई और पेयजल मंत्री हैं, पहले पर्यटन मंत्री थे. संसदीय कार्य मंत्री भी हैं. विधानसभा अध्यक्ष भी रह चुके हैं. बीजेपी में जब भी इस तरह की खलबली शुरू होती है तो प्रकाश पंत का नाम सीएम पद के संभावित दावेदारों में आने लगता है.
फ़िलहाल तो जैसा कि स्वाभाविक है वो कह रहे हैं कि वो इस दौड़ में नहीं हैं. लेकिन राजनीति में ‘नहीं’ के भी तो निहितार्थ होते हैं.
- हिलवाणी डेस्क

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Comments

gopal kumar baunthiyal2010-07-06 09:20 AM
gen shahib a maverick & politically senile person was a apolitical messiah of uttarakhand who lost his sheen because of his weaknees for sarangi & political clout. He was tactless & displeased many of his colleagues who were out to gun him down & in the end succeeded. They are no longer going to bite his pie as long as he is out of power. The disservice he has done to himself by not taking his team together & insulated himself from common man when in power has dealt a sever blow to his political career. I wish him good luck . There is nothing to extol on his tenure as CM which was colorless & sullied because of his supercilious attitude.

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