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काल से होड़ लेता था एक लोककविः गुणानंद पथिक


1994 की बात है. फ़्रीलासिंग की आननफ़ानन तेज़ी और व्यग्रताओं के दिन थे. नवभारत टाइम्स में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार और हिंदी कवि इब्बार रब्बी ने मुझे गुणानंद पथिक से मुलाक़ात करने और उन पर एक राइटअप तैयार करने को कहा था. उस समय गुणानंद पथिक 84 साल के थे. उत्तराखंड राज्य निर्माण की हलचलें थीं. पथिक जी सरकारी फ़ाइलों में पेंशनयाफ़्ता स्वतंत्रता सेनानी थे. देहरादून की नेहरु कॉलोनी के एक छोटे से मकान में पहुंचा, उन्हें ढूंढता हुआ. उनसे मिलना हुआ और देर तक बात हुई. उस समय टेप में बातचीत रिकॉर्ड करने की न समझ थी न संसाधन. नोट करता रहा. जो लिखा, रब्बी जी को लाकर सौंप दिया दिल्ली में. उन्हें पसंद आया. लेख छप गया. पता नहीं वो लेख पथिकजी तक पहुंचा भी था या नहीं. आज इतने साल बाद हिलवाणी का जब पहला अंक सामने है तो हिलवाणी विशेष में पथिक जी का स्मरण करना एक कर्तव्य जैसा लग रहा है. 16 साल पुराने उस लेख को आज यहां पेश कर रहा हूं. शब्द सूचना संसाधन आ गए हैं लेकिन वो पत्रकारीय और लेखकीय कच्चापन तो जो है सो है, पथिक ने जो कहा वो उत्तराखंड और देश के पहाड़ी आदिवासी समाजों के संदर्भ में आज भी अपनी अहमियत रखता है. पथिक जी की याद में वही लेख नीचे: 
अपने यहां लोकसंस्कृति और परंपरा के सम्मान के नाम पर जो निहायत बेशर्म दुकानदारी और दलालगिरी चल पड़ी है, उसने कई तरीक़ों से अपने लोक समाज के प्रति हमारी बुनियादी समझ और दिलचस्पी को धराशायी किया है. जिन लोगों की साधना और अथक मेहनत से लोक संस्कृति छोटे दायरे में ही सही, जीवित रह पाई और जिस पर दलालों ने हाथ साफ़ किया, ऐसे साधक हाशिए पर धकेल दिए गए. कुछ चतुर ‘व्यापारियों’ ने सतही बातें रटी और मीडिया ने उन्हें हाइलाइट किया. लोक समाज के साथ बाहर के संपर्क सूत्र ये लोग बन गए. उत्तराखंड की भी कमोबेश यही त्रासदी रही है कि उसकी लोक संस्कृति पर धीरे धीरे धूल की परत जमती गई. उसको बचाने वाले और जिलाने वाले भी किनारे पर धकेल दिए गए. लेकिन हाशिए पर अंतत हलचल जीवित रही. उसकी गूंज अब भी सुनाई देती है. ऐसी ही एक सख़्त गूंज हैं- गुणानंद पथिक.
जिन ढोल बाजणो और औजियो ने पहाड़ी लोक संगीत रचा और गाया उन पर लोकनायकों की शौर्यगाथा का संगीतबद्ध विवरण देने वाली तमाम लोककलाओं पर अपनी तरह का अनुसंधान किया पथिक ने. वे कुशल लोक संगीतकार ही नहीं बिल्कुल खरे लोककवि भी हैं. अंग्रेज़ों, राजशाही, और कठमुल्लावाद के अलग अलग मोर्चों पर जूझने वाले पहाड़ी योद्धाओं में एक नाम गुणानंद पथिक का भी है. एक ओर राजा जनता की बुनियादी ज़रूरतों और दैनिक कार्यकलापों पर कर ठोक रहा था उसके समांतर पथिक गले में हारमोनियम डाल गांव गांव राजा के ख़िलाफ़ ‘हलचल’ पैदा कर रहे थे.
“मैंने ‘हलचल’ लिखने के बाद उसे लोगों में बांटना और गाना शुरू किया तो तुरंत ज़ब्त कर ली गई. हमारी गिरफ़्तारी के वारंट निकले. हम तो गिरफ़्तार नहीं हुए, लेकिन राजा ख़ुद हमारी गिरफ़्त में आ गया,” 84 साल के पथिक बड़े जोश से बताते हैं. अपने समय की रूढ़िवादी वर्जनाओं को तोड़ने में अपने तई जो ज़िम्मेदार भूमिका मार्क्सवाद में गहरी आस्था रखने वाले पथिक ने निभाई, वह एक महत्वपूर्ण घटना है. आज के हालात की अपेक्षा उस समय की बुराइयों और विषमताओं को वे अधिक प्रचंड और भयावह मानते हैं. पथिक बताते हैं कि, “उस सामंती युग में लोकसमाज, लोकसंस्कृति, लोककला दासी के रूप में बंदी थे. सामंती तिकड़म ने पहाड़ में अपने किस्म के प्रयोग किए, अस्पृश्यता ऐसा ही एक प्रयोग था. सन 47 के पश्चात, घटाटोप अंधेरे में जी रहे समाज में कुछ आशा जगी, लेकिन जल्दी ही यह आशा भी धूमिल हो गई. कारण, लोक परंपरा और संस्कृति की मूल भावनाओं का अनादर करते हुए अवसरवादी लोगों ने अच्छा मौक़ा देखते हुए व्यक्तिवादी और प्रचारवादी तरीक़े से सब कुछ तोड़ मरोड़ कर पेश किया.”
आज़ादी की लड़ाई में पथिक लाहौर जेल में बंद रहे. वहां से छूटकर पथिक टिहरी आ गए. श्रीदेव सुमन के रूप में पथिक को सही दिशा मिली. राजशाही के जुल्मों के ख़िलाफ़ हल्ला बोल दिया गया. पथिक के रचनाकर्म की शुरुआत लाहौर जेल से हुई, जहां उन्होंने ‘नौनी का आंसू’ की रचना की. ‘पौणपाणी’, ‘मनहूस शराबी’, ‘तीन दुश्मन’, ‘रैबार’ आदि उनकी अन्य प्रकाशित रचनाएं हैं. संघर्ष के लिए आम जनता को किस तरह तैयार किया और व्यक्तिगत स्तर पर किस तरह संघर्ष का बिगुल बजाया. पूछने पर पथिक बताते हैं कि, “मुझे लगा शोषित पीड़ित जनता में संघर्ष चेतना को जगाने के लिए लोकसमाज के भीतर जाकर अध्ययन करना ज़रूरी है. लोक साहित्य और संगीत के ज़रिए भी ये काम हो सकता है.” पथिक ने जनवादी गीत रचे जो एक निरक्षर पहाड़ी भी समझ और गुनगुना सकता था, गीतों को किताब के रूप में गांव गांव बांटा, हारमोनियम गले में डाला और अपने लिखे गीत गाते हुए पथिक गांव गांव घूमे. कहीं मेला लगता या किसी घर में कोई समारोह हो रहा होता पथिक हारमोनियम लेकर राजा के सिपाहियों से पहले पहुंच जाते. गांधी जी का प्यारा हरिजन गीत की उन दिनों धूम रहती.
“झगुली टोपली यून सिल्यन, जूता कपड़ा यून सिल्यन, कुड़ी पोंगड़ी यून चिणयन, गौंसे किन्यारा करयां किलै, बरनारायण कांध चढ़ौंदा, ढोल बाजणा घरु घरु बजौंदा, मंदिर मंडला यूं से चिणौदा, अर फिर भी किन्यारा करयां किलै….”
टिहरी की सकलाना पट्टी में एक गांव है तिलवाड़ी. राजा के ख़िलाफ़ वहां के किसानों को गोलियों का निशाना बनाया गया, उस हृदयविदारक घटना को पथिक ने यूं कलमबद्ध कियाः “खाने के बर्तन भी लूटे, हुक्के तक भी न घर में छूटे, राक्षस दल ज्यों गांव पे टूटा, होता यूं नुकसान देखा, गोली डंडे चले तड़ातड़, तिलवाड़ी मैदान देखा…” पथिक का एक बड़ा काम ये भी था कि उन्होंने रामचरितमानस का गढ़वाली में अनुवाद किया और रामलीला और कृष्णलीला कराईं. राजा के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की भावना विकसित करने के लिए वो इन कथानकों का सहारा ले रहे थे. राजा नहीं चाहता था कि राजाओं का वध दिखाने वाली ये गाथाएं प्रदर्शित की जाएं. पथिक ने निर्भयता से राजा के आदेश का उल्लंघन किया और टोलियां विकसित कीं.   
उत्तराखंड में प्रजामंडल आंदोलन की शुरुआत करने वालों में पथिक भी एक थे. पथिक ने लोक संगीत की गहरी साधना की है. “लोक संगीत को व्यवसायिक भव्यता और चमकचौंध से बांधने वालों ने इसके मौलिक रूप को नष्ट भ्रष्ट किया”, बताते हुए पथिक के चेहरे पर दुख घिर आता है. तक़लीफ़ यही नहीं है. पहाड़ में 1947 से पहले और आज़ादी के बाद का कुछ समय राजनैतिक और सामाजिक जागरुकता का उफ़ान बिंदु था. लोगों में जोश और उत्साह था. वहीं मौजूदा दौर में जागरुकता और चेतना का वह दृश्य मंच से उखड़ गया है. पथिक कहते हैं कि, “पहाड़ में पूंजीवाद ने आज़ादी के बाद बहुत उलटपलट की. कहीं चीज़ों का प्रवाह और गति रोक दी गई तो कहीं सही दिशा में जा रही चीज़ों को अपने हिसाब से मोड़ा गया. अवसरवाद और स्वार्थी महत्वाकांक्षाओं ने तेज़ी से सिर उठाया. फिर विकास के हर क्षेत्र में चाहे वह शिक्षा हो या संस्कृति या रहनसहन या तकनीकीकरण या पर्यावरण.”
लोक गाथाओं पर लिखी पथिक की कई रचनाएं अप्रकाशित हैं. अपने बल पर उन्हें छपाने में पथिक असमर्थ हैं. वे छप जाएं तो हमारे लोक समाज के लिए कुछ नया ही जुड़ेगा. पथिक का ये आसक्तिपूर्ण आग्रह नहीं है. भले ही पथिक देहरादून के एक कोने में तक़लीफ़देह स्थितियों में जीवन की शाम गुज़ार रहे हों लेकिन वो असाधारण हठ उनमें अब भी मौजूद हैं जो एक आस्थावान मार्क्सवादी में हो सकता है. सरकारी कॉलोनी के एक जर्जर से दिखते मकान के बाहर उजाड़ तपाड़ पर दो कुर्सियां डालकर हमने बातें की. पास ही क्रिकेट खेल रहे बच्चों के बीच से किरमिच की गेंद पथिक जी की बायीं कनपटी पर ज़ोर से लगी. कमज़ोर थकी हड्डियां बिलबिला गईं. पथिक जी दर्द से कराह उठे फिर ख़ुद को संभालते हुए उदास मुस्कान के साथ बोले, “परिस्थिति की मार है यह.”
आज़ादी की लड़ाई के एक महत्वपूर्ण सिपाही और जनकवि को कोई नहीं पहचानता. उदासीन और साधन विपन्न पथिक कम से कम रचना और शब्द विहीन नहीं हुए हैं. 84 की उम्र में भी पथिक की ग़रज़दार आवाज़ को सुनकर शमशेर बहादुर सिंह की पंक्तियां याद आती है, “काल तुझसे होड़ है मेरी, अपराजित तू, तुझमें अपराजित मैं वास करूं, इसीलिए तेरे हृदय में समा रहा हूं, सीधा तीर सा जो रुका हुआ लगता है, सौंदर्य यही तो है जो तू नहीं हैं, ओ काल, जो मैं हूं, मैं कि जिसमें सब कुछ हैं..”

-शिवप्रसाद जोशी

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